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Rahu Ketu Mantra in English

Rahu Mantra in English
Om bhram bhreem bhroum sah rahave namah ll

Ketu Mantra in English
Om shram shreem shroum sah ketave namah ll

केतु का मंत्र (Ketu Graha Mantra in Hindi):

ऊं नमो अर्हते भगवते श्रीमते पार्श्‍व तीर्थंकराय धरेन्‍द्रयक्ष पद्मावतीयक्षी सहिताय |
ऊं आं क्रों ह्रीं ह्र: केतुमहाग्रह मम दुष्‍टग्रह, रोग कष्‍टनिवारणं सर्व शान्तिं च कुरू कुरू हूं फट् || 7000 जाप्‍य ||

मध्‍यम मंत्र – ऊं ह्रीं क्‍लीं ऐं केतु अरिष्‍टनिवारक श्री मल्लिनाथ जिनेन्‍द्राय नम: शान्तिं कुरू कुरू स्‍वाहा || 7000 जाप्‍य ||

लघु मंत्र– ऊं ह्रीं णमो लोए सव्‍वसाहूणं || 10000 जाप्‍य ||

तान्त्रिक मंत्र– ऊं स्‍त्रां स्‍त्रीं स्‍त्रौं स: केतवे नम: || 17000 जाप्‍य ||

राहु ग्रह का मंत्र (Rahu Graha Mantra in Hindi):

ऊं नमो अर्हते भगवते श्रीमते नेमि तीर्थंकराय सर्वाण्‍हयक्ष कुष्‍मांडीयक्षी सहिताय |
ऊं आं क्रौं ह्रीं ह्र: राहुमहाग्रह मम दुष्‍टग्रह, रोग कष्‍ट निवारणं सर्व शान्तिं च कुरू कुरू हूं फट् || 18000 जाप्‍य ||

मध्‍यम मंत्र– ऊं ह्रीं क्‍लीं श्रीं हूं: राहुग्रहारिष्‍टनिवारक श्री नेमिनाथ जिनेन्‍द्राय नम: शान्तिं कुरू कुरू स्‍वाहा || 18000 जाप्‍य ||

लघु मंत्र– ऊं ह्रीं णमो लोए सव्‍वसाहुणं || 10000 जाप्‍य ||

तान्त्रिक मंत्र – ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: || 18000 जाप्‍य ||

Tulasi Kavacham in Sanskrit

Tulasi Kavacham in Sanskrit Lyrics

श्री गणेशाय नमः ||

अस्य श्री तुलसीकवच स्तोत्रमंत्रस्य |
श्री महादेव ऋषिः | अनुष्टुप्छन्दः |
श्रीतुलसी देवता | मन ईप्सितकामनासिद्धयर्थं जपे विनियोगः |

तुलसी श्रीमहादेवि नमः पंकजधारिणी |
शिरो मे तुलसी पातु भालं पातु यशस्विनी || १ ||

दृशौ मे पद्मनयना श्रीसखी श्रवणे मम |
घ्राणं पातु सुगंधा मे मुखं च सुमुखी मम || २ ||

जिव्हां मे पातु शुभदा कंठं विद्यामयी मम |
स्कंधौ कह्वारिणी पातु हृदयं विष्णुवल्लभा || ३ ||

पुण्यदा मे पातु मध्यं नाभि सौभाग्यदायिनी |
कटिं कुंडलिनी पातु ऊरू नारदवंदिता || ४ ||

जननी जानुनी पातु जंघे सकलवंदिता |
नारायणप्रिया पादौ सर्वांगं सर्वरक्षिणी || ५ ||

संकटे विषमे दुर्गे भये वादे महाहवे |
नित्यं हि संध्ययोः पातु तुलसी सर्वतः सदा || ६ ||

इतीदं परमं गुह्यं तुलस्याः कवचामृतम् |
मर्त्यानाममृतार्थाय भीतानामभयाय च || ७ ||

मोक्षाय च मुमुक्षूणां ध्यायिनां ध्यानयोगकृत् |
वशाय वश्यकामानां विद्यायै वेदवादिनाम् || ८ ||

द्रविणाय दरिद्राण पापिनां पापशांतये || ९ ||

अन्नाय क्षुधितानां च स्वर्गाय स्वर्गमिच्छताम् |
पशव्यं पशुकामानां पुत्रदं पुत्रकांक्षिणाम् || १० ||

राज्यायभ्रष्टराज्यानामशांतानां च शांतये |
भक्त्यर्थं विष्णुभक्तानां विष्णौ सर्वांतरात्मनि || ११ ||

जाप्यं त्रिवर्गसिध्यर्थं गृहस्थेन विशेषतः |
उद्यन्तं चण्डकिरणमुपस्थाय कृतांजलिः || १२ ||

तुलसीकानने तिष्टन्नासीनौ वा जपेदिदम् |
सर्वान्कामानवाप्नोति तथैव मम संनिधिम् || १३ ||

मम प्रियकरं नित्यं हरिभक्तिविवर्धनम् |
या स्यान्मृतप्रजा नारी तस्या अंगं प्रमार्जयेत् || १४ ||

सा पुत्रं लभते दीर्घजीविनं चाप्यरोगिणम् |
वंध्याया मार्जयेदंगं कुशैर्मंत्रेण साधकः || १५ ||

साSपिसंवत्सरादेव गर्भं धत्ते मनोहरम् |
अश्वत्थेराजवश्यार्थी जपेदग्नेः सुरुपभाक || १६ ||

पलाशमूले विद्यार्थी तेजोर्थ्यभिमुखो रवेः |
कन्यार्थी चंडिकागेहे शत्रुहत्यै गृहे मम || १७ ||

श्रीकामो विष्णुगेहे च उद्याने स्त्री वशा भवेत् |
किमत्र बहुनोक्तेन शृणु सैन्येश तत्त्वतः || १८ ||

यं यं काममभिध्यायेत्त तं प्राप्नोत्यसंशयम् |
मम गेहगतस्त्वं तु तारकस्य वधेच्छया || १९ ||

जपन् स्तोत्रं च कवचं तुलसीगतमानसः |
मण्डलात्तारकं हंता भविष्यसि न संशयः || २० ||

|| इति श्रीब्रह्मांडपुराणे तुलसीमाहात्म्ये तुलसीकवचं नाम स्तोत्रं श्रीतुलसी देवीं समर्पणमस्तु ||

Papmochni Ekadasi Vrat Katha – पाप मोचनी एकादशी व्रत कथा

Papmochni Ekadasi Vrat Katha – पाप मोचनी एकादशी व्रत कथा

Ekadashi which comes between Holika Dahan and Chaitra Navratri is known as Papmochani Ekadashi. It falls before Yugadi and it is the last Ekadashi of the year. In 2016 Papmochni Ekadasi is on  3 April, 2016.

पुराणों के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी पाप मोचिनी है (Chaitra kirshna paksha Ekadashi know as Papmochani Ekadashi) अर्थात पाप को नष्ट करने वाली. स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने इसे अर्जुन से कहा है.

पाप मोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochni Ekadasi Vrat Katha in Hindi)

कथा के अनुसार भगवान अर्जुन से कहते हैं, राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है. राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे. इस वन में एक दिन मंजुघोषा नामक अप्सरा की नज़र ऋषि पर पड़ी तो वह उनपर मोहित हो गयी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु यत्न करने लगी. कामदेव भी उस समय उधर से गुजर रहे थे कि उनकी नज़र अप्सरा पर गयी और वह उसकी मनोभावना को समझते हुए उसकी सहायता करने लगे. अप्सरा अपने यत्न में सफल हुई और ऋषि कामपीड़ित हो गये.

काम के वश में होकर ऋषि शिव की तपस्या का व्रत भूल गये और अप्सरा के साथ रमण करने लगे. कई वर्षों के बाद जब उनकी चेतना जगी तो उन्हें एहसास हुआ कि वह शिव की तपस्या से विरत हो चुके हैं उन्हें तब उस अप्सरा पर बहुत क्रोध हुआ और तपस्या भंग करने का दोषी जानकर ऋषि ने अप्सरा को श्राप दे दिया कि तुम पिशाचिनी बन जाओ. श्राप से दु:खी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिए अनुनय करने लगी.

मेधावी ऋषि ने तब उस अप्सरा को विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत (Chaitra Krishna Ekadasi Vrat) करने के लिए कहा। भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था अत: ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया जिससे उनका पाप नष्ट हो गया। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गयी और उसे सुन्दर रूप प्राप्त हुआ व स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गयी.

पाप मोचनी एकादशी व्रत विधि (Papmochni Ekadasi vrat vidhi):

पाप मोचनी एकादशी के विषय में भविष्योत्तर पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। व्रती दशमी तिथि को एक बार सात्विक भोजन करे और मन से भोग विलास की भावना को निकालकर हरि में मन को लगाएं। एकादशी के दिन सूर्योदय काल में स्नान करके व्रत का संकल्प करें। संकल्प के उपरान्त षोड्षोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करें। पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करें। एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें पश्चात स्वयं भोजन करें.

Navagraha Stotram in Sanskrit

Navagraha Stotram in Sanskrit Lyrics

|| नवग्रह स्तोत्र ||
अथ नवग्रह स्तोत्र ||
श्री गणेशाय नमः ||

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम् |
तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम् || १ ||

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् |
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् || २ ||

धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् |
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम् || ३ ||

प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम् |
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् || ४ ||

देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम् |
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् || ५ ||

हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् |
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् || ६ ||

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् |
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् || ७ ||

अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम् |
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् || ८ ||

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम् |
रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् || ९ ||

इति श्रीव्यासमुखोग्दीतम् यः पठेत् सुसमाहितः |
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति || १० ||

नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् |
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् || ११ ||

ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः |
ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः || १२ ||

|| इति श्रीव्यास विरचितम् आदित्यादी नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं ||

Hanuman Chalisa in Telugu

Hanuman Chalisa in Telugu Lyrics

హనుమాన్ చాలీసా

దోహా-
శ్రీగురు చరన సరోజ రజ నిజ మను ముకుర సుధార
బరణౌం రఘువర విమల యశ జో దాయకు ఫలచార ||

బుద్ధిహీన తను జానికే సుమిరౌం పవనకుమార
బల బుద్ధి విద్యా దేహు మోహిఁ హరహు కలేస వికార ||

చౌపాయీ-
జయ హనుమాన జ్ఞాన గుణ సాగర |
జయ కపీశ తిహుం లోక ఉజాగర || ౧ ||

రామ దూత అతులిత బల ధామా |
అంజనిపుత్ర పవనసుత నామా || ౨ ||

మహావీర విక్రమ బజరంగీ |
కుమతి నివార సుమతి కే సంగీ || ౩ ||

కంచన బరన విరాజ సువేసా |
కానన కుండల కుంచిత కేశా || ౪ ||

హాథ వజ్ర ఔ ధ్వజా విరాజై |
కాంధే మూంజ జనేఊ సాజై || ౫ ||

సంకర సువన కేసరీనందన |
తేజ ప్రతాప మహా జగ వందన || ౬ ||

విద్యావాన గుణీ అతిచాతుర |
రామ కాజ కరిబే కో ఆతుర || ౭ ||

ప్రభు చరిత్ర సునిబే కో రసియా |
రామ లఖన సీతా మన బసియా || ౮ ||

సూక్ష్మ రూప ధరి సియహిఁ దిఖావా |
వికట రూప ధరి లంక జరావా || ౯ ||

భీమ రూప ధరి అసుర సంహారే |
రామచంద్ర కే కాజ సంవారే || ౧౦ ||

లాయ సజీవన లఖన జియాయే |
శ్రీరఘువీర హరషి ఉర లాయే || ౧౧ ||

రఘుపతి కీన్హీ బహుత బడాయీ |
తుమ మమ ప్రియ భరత సమ భాయీ || ౧౨ ||

సహస వదన తుమ్హరో యస గావైఁ |
అస కహి శ్రీపతి కంఠ లగావైఁ || ౧౩ ||

సనకాదిక బ్రహ్మాది మునీశా |
నారద శారద సహిత అహీశా || ౧౪ ||

యమ కుబేర దిక్పాల జహాం తే |
కవి కోవిద కహి సకే కహాం తే || ౧౫ ||

తుమ ఉపకార సుగ్రీవహిం కీన్హా |
రామ మిలాయ రాజ పద దీన్హా || ౧౬ ||

తుమ్హరో మంత్ర విభీషన మానా |
లంకేశ్వర భయే సబ జగ జానా || ౧౭ ||

యుగ సహస్ర యోజన పర భానూ |
లీల్యో తాహి మధుర ఫల జానూ || ౧౮ ||

ప్రభు ముద్రికా మేలి ముఖ మాహీఁ |
జలధి లాంఘి గయే అచరజ నాహీఁ || ౧౯ ||

దుర్గమ కాజ జగత కే జేతే |
సుగమ అనుగ్రహ తుమ్హరే తేతే || ౨౦ ||

రామ దుఆరే తుమ రఖవారే |
హోత న ఆజ్ఞా బిను పైసారే || ౨౧ ||

సబ సుఖ లహై తుమ్హారీ సరనా |
తుమ రక్షక కాహూ కో డర నా || ౨౨ ||

ఆపన తేజ సంహారో ఆపై |
తీనోఁ లోక హాంక తేఁ కాంపై || ౨౩ ||

భూత పిశాచ నికట నహిఁ ఆవై |
మహావీర జబ నామ సునావై || ౨౪ ||

నాశై రోగ హరై సబ పీరా |
జపత నిరంతర హనుమత వీరా || ౨౫ ||

సంకటసే హనుమాన ఛుడావై |
మన క్రమ వచన ధ్యాన జో లావై || ౨౬ ||

సబ పర రామ తపస్వీ రాజా |
తిన కే కాజ సకల తుమ సాజా || ౨౭ ||

ఔర మనోరథ జో కోయీ లావై |
తాసు అమిత జీవన ఫల పావై || ౨౮ ||

చారోఁ యుగ ప్రతాప తుమ్హారా |
హై ప్రసిద్ధ జగత ఉజియారా || ౨౯ ||

సాధు సంత కే తుమ రఖవారే |
అసుర నికందన రామ దులారే || ౩౦ ||

అష్ట సిద్ధి నవ నిధి కే దాతా |
అస బర దీన జానకీ మాతా || ౩౧ ||

రామ రసాయన తుమ్హరే పాసా |
సదా రహో రఘుపతి కే దాసా || ౩౨ ||

తుమ్హరే భజన రామ కో పావై |
జన్మ జన్మ కే దుఖ బిసరావై || ౩౩ ||

అంత కాల రఘుపతి పుర జాయీ |
జహాఁ జన్మి హరిభక్త కహాయీ || ౩౪ ||

ఔర దేవతా చిత్త న ధరయీ |
హనుమత సేయి సర్వ సుఖ కరయీ || ౩౫ ||

సంకట కటై మిటై సబ పీరా |
జో సుమిరై హనుమత బలవీరా || ౩౬ ||

జై జై జై హనుమాన గోసాయీఁ |
కృపా కరహు గురు దేవ కీ నాయీఁ || ౩౭ ||

యహ శత బార పాఠ కర కోయీ |
ఛూటహి బంది మహా సుఖ హోయీ || ౩౮ ||

జో యహ పఢై హనుమాన చలీసా |
హోయ సిద్ధి సాఖీ గౌరీసా || ౩౯ ||

తులసీదాస సదా హరి చేరా |
కీజై నాథ హృదయ మహ డేరా || ౪౦ ||

దోహా-
పవనతనయ సంకట హరణ
మంగల మూరతి రూప ||
రామ లఖన సీతా సహిత
హృదయ బసహు సుర భూప ||

Eknath Sashti – Jala Samadhi Din

Eknath Sashti

This is the day on which sant eknath left his body in river Godavari and took Jala samadhi at Paithan. Every year in falgun (marathi month) 5 to 6 lacks devotees gather together. Around 600 “Dindi” (mob of warkaries) enjoying three days of this festival. This festival is second largest festival in Maharashatra next to Aashadhi Ekadashi Pandharpur. It takes place around March–April. The 2016 date is March 29.

श्रीएकनाथष्ठी हा दिवस महाराष्ट्रात आणि महाराष्ट्राबाहेर श्रीएकनाथमहाराज जलसमाधी दिन ( Jala Samadhi Din ) म्हणुन साजरा करण्यात येतो. विशेषत: पैठणमध्ये सहा ते सात लाख भाविक ह्या सोहळ्यास उपस्थित असतात.पैठण येथील नाथषष्ठीची वारी वारकरी संप्रदायातील दुसऱ्या क्रमांकाची मोठी वारी असून पंढरपुरच्या आषाढी वारी नंतर ह्या वारीस मोठया प्रमाणावर वारकरी समाज एकत्रित होतो. विविध ठिकाणांहून आलेल्या ४७५ दिंडया, “भानुदास-एकनाथ” चा गजर हयामुळे संपूर्ण परिसर न्हाऊन निघतो.

फाल्गून वद्य षष्ठी, सप्तमी व अष्टमी (साधारणत: मार्च महिना) ह्या दिवसांत हा उत्सव साजरा करण्यात येतो. द्वितीयेस गावातील नाथमंदिरातील रांजणाच्या पूजेनं उत्सवाची सुरूवात होते. द्वितीया ते पंचमीपर्यन्त श्रीकेशवस्वामीकृत नाथ चरित्राचे पारायण करण्यात येते. पंचमीच्या दिवशी मानकऱ्यांना उत्सवाचे आमंत्रण दिले जाते.

उत्सवाचा इतिहास – फा.व.६ ह्या दिवशी पाच घटना घडल्याने त्यांना पंचपर्वश्रेणी असं म्हणतात. नाथ स्वत: आपल्या गुरुंचा जन्मदिवस व पुण्यतिथी म्हणून यादिवशी उत्सव साजरा करीत. पुढे नाथांनीही ह्याच दिवशी जलसमाधी घेतल्याने श्रीएकनाथषष्ठी म्हणून हा दिवस साजरा करण्यात येवू लागला.

पंचपर्व –
१) नाथांचे गुरू श्री जनार्दनस्वामी यांचा जन्म
२) स्वामींना दत्तात्रयांचे दर्शन व अनुग्रह
३) नाथांना स्वामींचे प्रथमदर्शन व अनुग्रह
४) श्री जनार्दनस्वामी पुण्यतिथी
५) श्रीएकनाथमहाराज जलसमाधी

Sant Tukaram Beej in English

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Sant Tukaram Beej

Tukaram Beej is the day when it is believed that Sant Tukaram bodily ascended to Vaikunth, the heavenly abode of Lord Vishnu.
In 2016, the date of Sant Tukaram Beej is march 25. It is seen on the second day of the krishna paksha (winding down period of moon) in the falgun or phalugna month (february – march) according to customary marathi date-book. On the day, devotees gather at Tukaba Mandir and at scared places at afternoon and perform different puja and rituals as a sign of appreciation to grate Sant.
Vithoba temple at Dehu village in maharashtra is the origin of Sant Tukaram Maharaj and thousands of people pay respect to Siant Tukaram here on the day.

Sant Tukaram was great writer he has written several poems on god and social life called as Abhanga.
Shri Tukaram was the personality who had been self developed with religious scriptures , available books , with the interaction of social thinkers and his self life experiences and achieved the mass psychology and express his views through the poems which touches the hearts of common people of this universe. he has done the work through kirtan for the common people and really struggled in social life and the situation at that time in vogue.

Nako devraya anta aata pahu – नको देवराया अंत आता पाहू

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नको देवराया अंत आता पाहू

Sant Kanhopatra संत कान्होपात्रा

नको देवराया, अंत आता पाहू
प्राण हा सवर्था, जाऊ पाहे

हरिणीचे पाडस, व्याघ्रे धरियेले
मजलागी जाहले तैसे देवा

तुजविण ठाव न दिसे त्रिभुवनी
धावे हो जननी विठाबाई

मोकलूनी आस, जाहले उदास
घेई कान्होपात्रेस हृदयात

Vadani Kaval Gheta – वदनी कवळ

जेवणापूर्वीची प्रार्थना ( Jevanapurvichi Prarthana )

१.  भोजनाची जागा व जेवणासाठी वापरावयाची भांडी स्वच्छ ठेवा

२.  जेवायला सुरुवात करण्यापूर्वी हात, पाय व तोंड स्वच्छ धुऊन जेवायला बसा.

३. टेबल-खुर्चीवर किंवा नुसत्या जमिनीवर न बसता आसन घेऊन किंवा पाटावर बसा.

४.  जेवायला सुरुवात करण्यापूर्वी पुढील श्लोक म्हणा.

Vadani Kaval Gheta in Marathi

वदनी कवळ घेता नम घ्या श्रीहरीचे | सहज हवन होते नाम घेता फुकाचे |
जीवन करि जीवित्व अन्न हे पूर्ण ब्रम्ह | उदारभरण नोहे जाणिजे यज्ञ कर्म ||

५. अन्नग्रहण करण्यापूर्वी करावयाची प्रार्थना – `हे देवा, हे अन्न तुझ्या चरणी अर्पण करून तुझा प्रसाद या भावाने मी ग्रहण करत आहे. या प्रसादातून मला शक्‍ती व चैतन्य मिळू दे.’

६. अन्न देवाला अर्पण करा व नंतर देवाचा प्रसाद म्हणून नामजप करत ग्रहण करा.

Vadani Kaval Gheta in English

Vadani kaval gheta naam ghya shree hariche |
Sahaj havan hote naam gheta phukache |
Jivan kari jivitva anna he purna bramha |
Udar bharan nohe janije yadnya karma ||

Amalaki Ekadashi Vrat Katha Vidhi

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Amalaki Ekadashi Vrat Katha Vidhi (आमलकी एकादशी व्रत कथा विधि)

Amalaka Ekadashi or Amalaki Ekadashi is a Hindu holy day, celebrated on the 11th day (Ekadashi) of the waxing moon, in the lunar month of Phalgun (February–March). It is also known as ‘Phalgun Shukla Ekadashi’. It is a celebration of the amalaka or amla tree (Phyllanthus emblica), known as the Indian gooseberry.

The god Vishnu, for whom ekadashis are sacred, is believed to reside in the tree. The amla tree is ritually worshiped on this day to get the grace of the deity. The day marks the beginning of the main celebrations of the festival of Holi, the Hindu festival of colours.

Amalaki Ekadashi is considered very auspicious for worshipping lord Vishnu with the Amalas and taking food made of amalas only. Anyone who observes this holy Amalaki Ekadashi will undoubtedly attain the supreme abode of Lord Vishnu, so great is the religious merit earned from the observance of this most sacred fast day.

आमलकी एकादशी महात्मय (Amalaki Ekadashi Importance in Hindi)

प्रकृति से मानव का सम्बन्ध आदि काल से है. मनुष्य सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रकृति की उपासना करता आ रहा है. वृक्ष में देवताओं का वास मानकर वृक्ष की उपासना भी की जाती रही है. पीपल और आंवले के वृक्ष को देवतुल्य मानकर उनकी आराधाना की जाती रही है, आमलकी एकादशी (Amalki Ekadasi) का व्रत इसी का प्रमाण है.

आमलकी यानी आंवले को शास्त्रों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है जैसा नदियों में गंगा को प्राप्त है और देवों में भगवान विष्णु को. विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया. आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है. इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है. भगवान विष्णु ने कहा है जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष में जो पुष्य नक्षत्र में एकादशी (Falgun Shukla Pusya Nakshatra Ekadashi) आती है उस एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है. इस एकादशी को आमलकी एकादशी (Amlki Ekadasi) के नाम से जाना जाता है.

आमलकी एकादशी व्रत विधि (Amalaki Ekadasi vrat Vidhan):

इस एकादशी के दिन प्रात: स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं. मेरा यह व्रत सफलता पूर्वक पूरा हो इसके लिए श्री हरि मुझे अपनी शरण में रखें. संकल्प के पश्चात षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें.

भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें. सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें. पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें. इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमत्रित करें. कलश में सुगन्धी और पंच रत्न रखें. इसके Šৠपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें. कलश के कण्ठ में श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं. अंत में कलश के Šৠपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम ( Parshuram Sixth incarnation vishnu) की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुराम जी की पूजा करें. रात्रि में भगवत कथा व भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें.

द्वादशी के दिन प्रात: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें. इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें.

आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha):

एक बार एक नगर था. इस नगर में सभी वर्गों के लोग मिलकर आनन्द पूर्वक रह्ते थें. लोगों का आपस में प्रेम होने के कारण धर्म और आस्था का निवास भी नगर में बना हुआ था. यह नगर चन्द्रवंशी नामक राजा के राज्य के अन्तर्गत आता था. उस राज्य में सभी सुखी थे, उस राज्य में विशेष रुप से श्री विष्णु जी की पूजा होती थी. और एकदशी व्रत करने की प्रथा उस नगर में प्राचीन समय से चली आ रही थी. राजा और प्रजा दोनों मिलकर एकादशी व्रत कुम्भ स्थापना करते थे. कुम्भ स्थापना के बाद धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से पूजा की जाती थी.

एक बार एकादशी व्रत करने के समय सभी जन मंदिर में जागरण कर रहे थे. रात्रि के समय एक शिकारी आया जो भूखा था, और वह लगभग सभी पापों का भागी था. मंदिर में अधिक लोग होने के कारण शिकारी को भोजन चुराने का अवसर न मिल सका और उस शिकारी को वह रात्रि जागरण करते हुए बितानी पडी. प्रात:काल होने पर सब जन अपने घर चले गए. और शिकारी भी अपने घर चला गया. कुछ समय बीतने के बाद शिकारी कि किसी कारणवश मृ्त्यु हो गई.

उस शिकारी ने अनजाने में ही सही क्योकि आमलकी एकादशी व्रत किया था, इस वजह से उसे पुन्य प्राप्त हुआ, और उसका जन्म एक राजा के यहां हुआ. वह बहुत वीर, धार्मिक, सत्यवादी और विष्णु भक्त था. दान कार्यो में उसकी रुचि थी. एक बार वह शिकार को गया और डाकूओं के चंगुल में फंस गया. डाकू उसे मारने के लिए शस्त्र का प्रहार करने लगे. राजा ने देखा की डाकूओं के प्रहार का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है.

और कुछ ऎसा हुआ की डाकूओं के शस्त्र स्वंय डाकूओं पर ही वार करने लगे. उस समय एक शक्ति प्रकट हुई, और उस शक्ति ने सभी डाकूओं को मृ्त्यु लोक पहुंचा दिया. राजा ने पूछा की इस प्रकार मेरी रक्षा करने वाला कौन है.? इसके जवाब में भविष्यवाणी हुई की तेरी रक्षा श्री विष्णु जी कर रहे है. यह कृ्पा आपके आमलकी एकादशी व्रत करने के प्रभावस्वरुप हुई है. इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.