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Rishi Panchami Vrat Katha in Hindi

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Rishi Panchami Vrat Story

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी ऋषि पंचमी के रुप में मनाई जाती है। इस व्रष ऋषि पंचमी व्रत 18 सितंबर 2015 को गुरुवार के दिन आया है। ऋषि पंचमी का व्रत सभी के लिए फल दायक होता है। इस व्रत को श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जाता है। आज के दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन कर कथा श्रवण करने का बहुत महत्व होता है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला व श्रेष्ठ फलदायी है। यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण एवं सम्मान की भावना को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण आधार बनता है।

ऋषि पंचमी पूजन | Rishi Panchami Puja Rituals

पूर्वकाल में यह व्रत समस्त वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था, किन्तु समय के साथ साथ अब यह अधिकांशत: स्त्रियों द्वारा किया जाता है। इस दिन पवित्र नदीयों में स्नान का भी बहुत महत्व होता है। सप्तऋषियों की प्रतिमाओं को स्थापित करके उन्हें पंचामृत में स्नान करना चाहिए। तत्पश्चात उन पर चन्दन का लेप लगाना चाहिए, फूलों एवं सुगन्धित पदार्थों, धूप, दीप, इत्यादि अर्पण करने चाहिए तथा श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मन्त्र जाप करना चाहिए।

ऋषि पंचमी कथा | Rishi Panchami Katha

एक समय विदर्भ देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थी। ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है परंतु काल के प्रभाव स्वरुप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है, और वह विधवा हो जाती है तथा अपने पिता के घर लौट आती है। एक दिन आधी रात में लड़की के शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगते है़।

अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर माता पिता दुख से व्यथित हो जाते हैं और पुत्री को उत्तक ॠषि के पास ले जाते हैं। अपनी पुत्री की इस हालत के विषय में जानने की प्रयास करते हैं। उत्तक ऋषि अपने ज्ञान से उस कन्या के पूर्व जन्म का पूर्ण विवरण उसके माता पिता को बताते हैं और कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसने एक बार रजस्वला होने पर भी घर बर्तन इत्यादि छू लिये थे और काम करने लगी बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं।

शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री का कार्य करना निषेध है परंतु इसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इसे इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। ऋषि कहते हैं कि यदि यह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करे और श्रद्धा भाव के साथ पूजा तथा क्षमा प्रार्थना करे तो उसे अपने पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे अपने पाप से मुक्ति प्राप्त होती है।

इसलिए उस पाप को शुद्धि के लिए ही हर स्त्री को ॠषि पंचमी का व्रत करना चाहिए।

 ऋषि पंचमी मंत्र  | Rishi Panchami Mantra

आयुर्बलम् यसो वर्चः प्रजाः पसु वसूनि च
ब्रह्मा प्रज्ञाम च मेधाम च तवं तो देवो वनस्पति

Chinchpokli Cha Chintamani First Look 2015

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Chinchpokli Cha Chintamani First Look 2015

Chinchpokli Cha Chintamani 2015

Chinchpokali is best pandal in Mumbai which everyone should visit and get hypnotized with Bappa’s mesmerizing smile!

Chinchpokli Cha Chintamani First Look 2015

How to reach : Ganpati is situated near Chinchpokali centrail railway station. You can come here by Mumbai local train.

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Vitthalachi Aarti Lyrics in Marathi

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Vitthalachi Aarti

युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा
वामाङ्गी रखुमाईदिसे दिव्य शोभा ।
पुण्डलिकाचे भेटि परब्रह्म आले गा
चरणी वाहे भीमा उद्धरी जगा ॥१॥

जय देव जय देव जय पाण्डुरङ्गा ।
रखुमाई वल्लभा राईच्या वल्लभा पावे जिवलगा ॥धृ०॥



तुळसीमाळा गळा कर ठेऊनी कटी
कासे पीताम्बर कस्तुरी लल्लाटी ।
देव सुरवर नित्य येती भेटी
गरुड हनुमन्त पुढे उभे राहती ॥२॥

धन्य वेणूनाद अणुक्षेत्रपाळा
सुवर्णाची कमळे वनमाळा गळा ।
राई रखुमाबाई राणीया सकळा
ओवाळिती राजा विठोबा सावळा ॥३॥

ओवाळू आरत्या कुरवण्ड्या येती
चन्द्रभागेमाजी सोडुनिया देती ।
दिण्ड्या पताका वैष्णव नाचती
पण्ढरीचा महिमा वर्णावा किती ॥४॥

आषाढी कार्तिकी भक्तजन येती
चन्द्रभागेमाजी स्नाने जे करिती ।
दर्शन होळामात्रे तया होय मुक्ति
केशवासी नामदेव भावे ओवाळिती ॥५॥

Datta Digambara Aarti Marathi Lyrics | श्री दत्त आरती

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Dattachi Aarti in Marathi Lyrics

त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा
त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा
नेति नेति शब्द न ये अनुमाना
सुरवर मुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना ॥१॥

सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त
अभाग्यासी कैसी न कळे ही मात
पराही परतली तेथे कैचा हा हेत
जन्म मरणाचा पुरलासे अंत ॥२॥

दत्त येऊनिया उभा ठाकला
भावे साष्टांगेसी प्रणिपात केला
प्रसन्न होउनी आशीर्वाद दिधला
जन्ममरणाचा फेरा चुकविला ॥३॥

दत्त दत्त ऐसे लागले ध्यान
हरपले मन झाले उन्मन
मी तू पणाची झाली बोळवण
एका जनार्दनी श्रीदत्त ध्यान ॥४॥

Ganesh Chaturthi – Ganesh Janam Katha

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Ganesh Janam Katha

Ganesh Janam Katha

Ganesh Chaturthi Katha

Ganesh Chaturthi is the most famous festival of India. This is the birthday of God Ganesha. It falls on the fourth day of the bright fortnight of Bhadrapada which falls in August or September calendar month. It is observed all through India as well as by devoted in all parts of the world.

Ganpati is the elephant-headed God. He is worshipped first in starting of new work or prayer. His names are rehashed first before any propitious work is started, before any sort of love is started. He is the God of power and wisdom. He is the eldest child of Shiva and the sibling of Skanda or Kartikeya. He is the strength of Shiva thus he is known as the child of Shankar and Parvati.

Each of the Puranas has an alternate story in regards to the birth of Lord Ganesh. In some he is the manasika putra (psyche conceived child) of Lord Shiva. In others he is the production of Parvati. In still others he is the child of Shiva and Parvati.

The most well known birth story of Lord Ganesh (Ganesh Chaturthi Katha) is Parvati’s Story. Once a while Parvati was going for her bath, she rubbed off the dust and oil from her body and out of it made the figure of a young child. She mixed life into the figure and let him know he was her child and ought to protect the the entrance when she went to bath.

After some time, Lord Shiva came to see Parvati however the young child block his way and would not let him go. Shiva, unconscious that this fellow was his child, got to be angry and in incredible resentment battled with the kid whose head got separated from his body in the fight.

When Parvati, return back from her bath, she saw her headless child, and in aggrieved anguish threatened to destroy the heavens and earth.

The gods and Shiva pacified her and the last conveyed his ganas, or crowds, to bring the first living being with his head towards the north (the auspicious direction associated with wisdom). The primary living animal they discovered laying down with his head toward the north was an elephant. They brought the head of elephant and Shiva placed it on the trunk of Parvati’s son and breathed life into him.

Parvati was happy and grab her child, the elephant-headed kid whom Shiva named Ganesh, the ruler of his ganas ” Ganpati”

Hartalika Teej Vrat in Hindi

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Hartalika Teej Vrat in Hindi

Hartalika Teej Vrat in Hindi

संकल्प शक्ति का प्रतीक और अखंड सौभाग्य की कामना का परम पावन व्रत हरतालिका तीज हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। हरतालिका तीज को हरियाली तीज भी कहा जाता है।

हरतालिका तीज व्रत (Hartalika Teej Vrat in Hindi)

नारी के सौभाग्य की रक्षा करनेवाले इस व्रत को सौभाग्यवती स्त्रियां अपने अक्षय सौभाग्य और सुख की लालसा हेतु श्रद्धा, लगन और विश्वास के साथ मानती हैं। कुवांरी लड़कियां भी अपने मन के अनुरूप पति प्राप्त करने के लिए इस पवित्र पावन व्रत को श्रद्धा और निष्ठा पूर्वक करती है। “हर” भगवान भोलेनाथ का ही एक नाम है और चूँकि शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ पार्वती ने इस व्रत को रखा था, इसलिए इस पावन व्रत का नाम हरतालिका तीज रखा गया।




कैसे करें हरतालिका तीज व्रत (Vrat vidhi of Hartalika Teej Vrat in Hindi)

इस व्रत के सुअवसर पर सौभाग्यवती स्त्रियां नए लाल वस्त्र पहनकर, मेंहदी लगाकर, सोलह शृंगार करती है और शुभ मुहूर्त में भगवान शिव और मां पार्वती जी की पूजा आरम्भ करती है। इस पूजा में शिव-पार्वती की मूर्तियों का विधिवत पूजन किया जाता है और फिर हरितालिका तीज की कथा को सुना जाता है। माता पार्वती पर सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। भक्तों में मान्यता है कि जो सभी पापों और सांसारिक तापों को हरने वाले हरितालिका व्रत को विधि पूर्वक करता है, उसके सौभाग्य की रक्षा स्वयं भगवान शिव करते हैं।

पौराणिक कथानुसार इस पावन व्रत को सबसे पहले राजा हिमवान की पुत्री माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए किया था और उनके तप और आराधना से खुश होकर भगवान शिव ने माता को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।

Hartalika Teej Puja Mantra

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Hartalika Teej Pooja 

Hartalika Teej Pooja Mantra

Hartalika Teej Mantra

India is the place where there is celebrations and Celebrations. Generally as on account of a few other Hindu celebrations, numerous conventions and customs are connected with Teej festivities. Established somewhere down in Indian religious and social ethos – Teej assumes a noteworthy part in characterizing the genuine way of relationship between a wedded couple. As indicated by customary Hindu lunar logbook, celebration of Hartalika Teej falls on the third day of the fortnight in the Bhadrapad month.

In the event that considered from Gregorian logbook, Hindu month Bhado falls between Augusts to September. festival of Hartalika Teej celebrated in Maharashtra & North India. Individuals from Uttar Pradesh, Madhya Pradesh and Bihar commend this celebration with incredible enthusiasm and fervor. Celebration of Hartalika Teej is committed to Maa Hartalika, who is none other than Goddess Parvati. Hartalika Teej is praised to celebrate the day when Lord Shiva acknowledged the affection for Parvati.

Mantra for Hartalika Teej Pooja

Mantra being enchanted during Puja of Goddess Parvati is
“Om Umayee Parvatayee Jagdayee Jagatprathisthayee Shantirupayee Shivayee Brahma Rupniyee”

And for Lord Shiva is
“Om Hrayee Maheshwarayee Shambhave Shul Padyee Pinakdhrashe Shivaye Pashupataye Mahadevayaa Namah”

Hartalika Teej Vrat Pooja Vidhi in Marathi

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Hartalika Vrat Pooja Vidhi in Marathi

ह्या आधी आपण हरितालिकेची कथा (Haritalika Katha) पाहिली. आता आपण या व्रताचे साहित्य आणि विधी समजून घेणार आहोत.

साहित्य
फुले, दूर्वा, तुलसीपत्रे, विड्याची पाने १२, सुपार्‍या ६, बदाम ५, खारका ५, नारळ २, फळे / केळी ५, पेढे ५ / खडीसाखर पत्री (पत्रपूजेतील क्रमानुसार)- बेल, आघाडा, मधुमालती, दूर्वा, चाफा, कण्हेर, बोर, रुई, तुळस, आंबा, डाळिंब, धोतरा, जाई, मरवा, बकुळ, अशोक .(उपलब्धीप्रमाणे)
सौभाग्यवायनसाहित्य
परडीत / पत्रावळीवर – हळदकुंकू, तांदूळ, वस्त्र, पानसुपारी, नाणे, नारळ, गजरा/वेणी, शिधा तसेच; फणी, काजळ, गळेसरी, कांकणे, आरसा इत्यादी सौभाग्यद्रव्ये.
गृह्यसाहित्य
अत्तरफाया, हळदकुंकू, चंदनगंध, अष्टगंध, गुलाल, बुक्का, अक्षता, रांगोळी, उदबत्ती, कापूर, आगपेटी, सुटीनाणी ६, तुपाच्या व तेलाच्या वाती, कापसाची मालावस्त्रे – १६ मण्यांचे १ व ५ मण्यांचे १, तांदूळ ( वाटीभर ) पंचामृत ( दूध, दही, तूप, मध, साखर ) गूळखोबरे, नैवेद्य, सुंठवडा (डिंकवडा), चौरंग / पाट, आसन, पाण्याचा कलश, शंख, घंटा, समई, नीराजने, कापूरारती, पळीपंचपात्र, ताम्हण, देव पुसण्याचे वस्त्र, हातपुसणे, तसराळे, पेलाभर उष्णोदक.

व्रतोद्देश
कुमारीना सुयोग्य वरप्राप्ती, सुवासिनींना अखंडसौभाग्यप्राप्ती.

पूजार्ह देवता
पार्वती व हरिताली : ( मृत्तिकेच्या मूर्ती व वाळूचे शिवलिंग )
पूजाकाल :भाद्रपद शुद्ध तृतीयेस प्रथम प्रहरात ही पूजा करावी
व्रताचार : ही पूजा अविवाहित व विवाहित अशा सर्वच स्त्रिया करतात . ह्या दिवशी उपवास करावा . रात्रौ यथाशक्ति जागरण करून देवीची आरती करावी .

हरितालिका पूजेची मांडणी –
चौरंगावर/पाटावर तांदळाच्या सपाट ढिग करून, त्यावर गौरी व हरिताली ह्यांच्या मूर्ती ठेवून त्यासमोर वाळूचे लिंग तयार करावे किंवा आपापल्या प्रथेप्रमाणे पूजेची मांडणी करावी. उजव्या बाजूस तांदळाच्या एका ढिगावरील सुपारीवर किंवा नारळावर गणपती मांडावा. समोर पाच विडे मांडून तेथे सुपारी, खारीक, बदाम, नाणे, फळ ठेवावे.

प्रथमसुवासिनीकडून/कुमारिकेकडून/स्वत: हळदकुंकूलावूनघ्यावे. त्यानंतर घरातील देवांसमोर विडे ठेवून, अक्षता व हळदकुंकू वाहून नमस्कारपूर्वक प्रार्थना करावी. तसेच घरातील वडीलधार्‍या मंडळींना नमस्कार करून नंतर पूजाप्रारंभ करावा.

हरितालिकेची आरती (Hartalika Teej Aarti)

जयदेवी हरितालिके सखी पार्वती अंबिके ।
आरती ओवाळीत ज्ञानदीपकळिके ।।ध्रु *।।
हरअर्धांगी वससी ।
जासी यज्ञा माहेरासी ।
तेथे अपमान पावसी ।
यज्ञकुंडी गुप्त होसी ।। 1 ।। *जय देवी *।।

रिघसी हिमाद्रिच्या पोटी ।
कन्या होसी तू गोमटी ।
उग्र तपक्ष्चर्या मोठी ।
आचरसी उठाउठी ।। 2 ।। *जय देवी *।।

तपपंचाग्निसाधने ।
धूम्रपानें अधोवदनें केली बहू उशोषणे ।
शंभू भ्रताराकारणे ।। 3 ।।* जय देवी * ।।

लीला दाखविसी द्रुष्टी ।
हे व्रत करिसी लोकांसाठी ।
पुन्हा वरिसी धूर्जटी ।
मज रक्षावे संकटी ।। 4 ।।*जय देवी * ।।

काय वर्णू तव गुण ।
अल्पमती नारायण ।
मातें दाखवी चरण ।
चूकवावे जन्ममरण ।। 5 ।।*जय देवी *।।

Hartalika Teej Vrat Katha in Marathi | हरतालिका कथा

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Haratalika Vrat Katha in Marathi

Haratalika Teej Vrat Katha in Marathi

गणेश चतुर्थींच्या आदल्या दिवशी म्हणजे भाद्रपद शुद्ध तृतियेला “हरतालिका” (Haratalika) असे म्हणतात.

या दिवशी पार्वती मातेची पूजा महिला करतात. हरतालिका या शब्दाची फोड “हरित` म्हणजे “हरण` करणे आणि “आलिका` म्हणजे “आलिच्या`-मैत्रिणीच्या असा आहे.
मैत्रिणींच्या साह्याने पार्वतीने केलेले शंकराचे हरण, असा या शब्दाचा अर्थ आहे.

हिंदू कुमारिका आपल्याला हवा असलेला, आपल्या मनासारखा पती मिळावी म्हणून “हरतालिका` हे व्रत अत्यंत मनापासून मनोभावे करतात. काही जणी हे व्रत कडक करतात. आपल्याकडे विवाहित स्त्रिया हे व्रत करतात. विवाह झाल्यानंतर इच्छित पती मिळाल्यानंतर ही करतात कारण एकदा घेतलेले शंकराचे व्रत मोडू नये अशी महिलांची श्रद्धा असते म्हणून त्याही हे व्रत आजन्म करतात.

हिमालयाचा राजा हिमवान याची पार्वती ही कन्या. पर्वताची कन्या म्हणून तिचे नाव “पार्वती` असे ठेवण्यात आले. तिचे लग्न कोणाबरोबर करावे अशी काळजी त्याला लागली होती. एकदा नारदमुनी हिमवानाकडे आले आणि त्याला म्हणाले, “हे पर्वतश्रेष्ठा ! तुझ्या या सुस्वरुप मुलीला मागणी घालण्यासाठी भगवान विष्णूंनी मला तुझ्याकडे पाठविले आहे. ते ऐकून हिमवानाला आनंद झाला. त्याने पार्वतीला ती बातमी सांगितली. पण पार्वतीने मनोमन कैलासराणा शंकराला पती म्हणून वरले होते. तसे प्रत्यक्ष पित्याला स्पष्टपणे सांगण्याचे धैर्य तिला झाले नाही. तिने आपल्या मैत्रिणींबरोबर आपल्या पित्याला निरोप पाठवला. “तुम्ही माझा दुसऱ्या कोणाबरोबरही विवाह करून दिला तर मी जीव देईन.`

पार्वती आपल्या मैत्रिणींसह अरण्यात निघून गेली. तिथे तिने घोर तपश्‍चर्या केली. नदीकाठी वाळूचे शिवलिंग तयार करून ती त्याची पूजा करू लागली. प्रथम ती फक्त झाडाची कोवळी पाने खाऊन राहत होती. पुढे तिने तेही सोडून दिले. त्यामुळे तिला “अपर्णा` असे नाव पडले. तिच्या तपश्‍चर्येने भगवान श्रीशिवशंकर प्रसन्न झाले आणि त्यांनी तिला वर मागायला सांगितले. ती म्हणाली, “तुम्ही माझ्या तपश्‍चर्येमुळे खरोखर प्रसन्न झाला असाल, तर माझे पती व्हा.` शंकराने “तथास्तु` म्हटले व निघून गेले. पार्वतीचा शोध घेत हिमवान त्या अरण्यात आला. तिला त्याने घर सोडून येण्याचे आणि तपश्‍चर्येचे कारण विचारले. तेव्हा तिने आपला दृढ निश्‍चय आपल्या वडिलांना सांगितला. भगवान श्रीशंकरांनी दिलेला वरही सांगितला.

तिचा दृढनिश्‍चय, श्रद्धा पाहून हिमवानाने तिचा विवाह भगवान श्री शंकराशी करून दिला. पार्वतीची निष्ठा आणि श्रद्धा व भक्ती यांचा विजय झाला. पार्वतीच्या शंकरावरील निष्ठेमुळे, प्रेमामुळे शंकराला “पार्वतीपती` असे नामाभिधान पडले.

इच्छित पती शंकराची प्राप्ती पार्वतीने आपल्या मैत्रिणींच्या साह्याने प्राप्त करून घेतली. पार्वतीने आपला वर कडक तपश्‍चर्येने मिळविला. त्याप्रमाणे मनाजोगता पती मिळावा म्हणून हिंदू कुमारिका, महिला हे व्रत श्रद्धापूर्वक करतात. या दिवशी दिवसभर उपवास करतात. काही जणी तर दिवसभरात पाण्याचा थेंबही तोंडात घेत नाहीत.

रात्री 12 वाजता बेलाचे पान चाटून, काही जणी रुईच्या पानावर मध लावून ते पान चाटून, तर कोणी खडीसाखर, केळी यांसारखे अगदी थोडेसेच खाऊन उपवास करतात. अर्थातच ज्यांना इतके कडक व्रत करता येत नाही. त्या स्त्रिया उपवासाचे पदार्थ खाऊन व्रत करतात.

या व्रताच्या वेळी स्वच्छ केलेल्या जागेवर एका जागी चौरंग ठेवतात. केळीच्या खांबांनी चारही बाजूंनी सुशोभित केलेल्या चौरंगावर पार्वती आणि शंकराची स्थापना करून त्याची षोडशोपचारे पूजा करतात. धूप-दीप, नैवेद्य दाखवून वेगवेगळ्या प्रकारची पत्री (पाने), फुलांची पूजा केली जाते. धूप-दीप, निरांजन दाखविला जातो. हरतालिकेच्या पूजेत जी पत्री वाहतात. त्यात जाई, शेवंती, पारिजातक , तुळशी, रुई, शमी, दुर्वा, आघाडा, चाफा, केवडा, डाळिंबाची पाने वाहतात. मनोभावे प्रार्थना करतात. “सखे पार्वती, तुला जसा इच्छित वर मिळाला तसा आम्हाला मिळू दे. अखंड सौभाग्य लाभू दे`, अशी प्रार्थना करून आरती केली जाते.या दिवशी पूजा झाल्यावर सुवासिनी, कुमारिका रात्रभर जागरण करतात. झिम्मा, फुगडी, टिपऱ्या, गोफ इत्यादी खेळ खेळतात.

Ghalin Lotangan Bhajan in Marathi | घालीन लोटांगण

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Ghalin Lotangan

Ghalin Lotangan Bhajan in Marathi

Ghalin Lotangan Bhajan in Marathi

Ghalin Lotangan bhajan (भजन) [bhajan means devotional song] is considered to be mandatory after performing an aarti of Lord Ganesha.

घालीन लोटांगण
घालीन लोटांगण, वंदीन चरण ।
डोळ्यांनी पाहीन रुप तुझें ।
प्रेमें आलिंगन, आनंदे पूजिन ।
भावें ओवाळीन म्हणे नामा ।।१।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बंधुक्ष्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विध्या द्रविणं त्वमेव ।
त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।२।।

कायेन वाचा मनसेंद्रीयेव्रा, बुद्धयात्मना वा प्रकृतिस्वभावात ।
करोमि यध्य्त सकलं परस्मे, नारायणायेति समर्पयामि ।।३।।

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं, जानकीनायकं रामचंद्र भजे ।।४।।

हरे राम हर राम, राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।