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Sai Vandana – Sai Reham Nazar Karna

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Sai Vandana – Sai Reham Nazar Karna

सांई रहम नजर करना, बच्चों का पालन करना ।
जाना तुमने जगत पसारा, सबही झूठ जमाना ।।

मैं अंधा हूँ बंदा आपका, मुझको प्रभु दिखलाना ।।
दास गनू कहे अब क्या बोलूं, थक गई मेरी रसना ।।

रहम नजर करो, अब मोरे साई ।
तुम बिन नहीं मुझे माँ बाप भाई ॥

मैं अंधा हूँ बंदा तुम्हारा ।
मैं ना जानूं अल्लाइलाही ।।

खाली जमाना मैंने गंवाया ।
साथी आखिर का किया न कोई ।।

अपने मस्जिद का झाडू गणू है ।
मालिक हमारे, तुम बाबा साई ।।

Jai Malhar Lyrics – Jai Deva Jai deva Jai Shiv Martanda

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Jai Malhar Lyrics – Jai Deva Jai deva Jai Shiv Martanda

जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा जय शिव मार्तंडा…
जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा जय शिव मार्तंडा…
हरी मदन मल्हारी तूची प्रचंडा…

अगड धूम नगारा सोन्याची जेजुरी,
देव गेले जेजुरा निळा घोडा…
अगड धूम नगारा सोन्याची जेजुरी
देव गेले जेजुरा निळा घोडा…

पाव मे तोडा… कमरी करगोटा,
बेंबी हिर, मस्तकी तुरा…

खोबर्‍याचा कुटका.. भंडार्‍याचा भडका
बोल अहंकरा, सदानंदाचा येळकोट…

जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा जय शिव मार्तंडा…
जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा जय शिव मार्तंडा…
हरी मदन मल्हारी तूची प्रचंडा…

जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा जय शिव मार्तंडा…
जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा, जय देवा जय शिव मार्तंडा…
हरी मदन मल्हारी तूची प्रचंडा…

सदानंदाचा येळकोट
येळकोट येळकोट जय मल्हार

Shri Ganesha Dwadasanama Stotram

Shri Ganesha Dwadasanama Stotram

॥ श्रीगणेश्द्वादशनामस्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशाय नमः ॥

शुक्लाम्बरधरं विश्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तयेः ॥ १॥

अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।
सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ २॥

गणानामधिपश्चण्डो गजवक्त्रस्त्रिलोचनः ।
प्रसन्नो भव मे नित्यं वरदातर्विनायक ॥ ३॥

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकतो विघ्ननाशो विनायकः ॥ ४॥

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि गणेशस्य तु यः पठेत् ॥ ५॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थि विपुलं धनम् ।
इष्टकामं तु कामार्थी धर्मार्थी मोक्षमक्षयम् ॥ ६॥

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ७॥

इति मुद्गलपुराणोक्तं श्रीगणेशद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

Shri Ganesh Stuti in Sanskrit

Shri Ganesh Stuti in Sanskrit

॥ श्रीगणेशस्तुती ॥

वन्दे गजेन्द्रवदनं वामाङ्कारूढवल्लभाश्लिष्टम् ।
कुङ्कुमरागशोणं कुवलयिनीजारकोरकापीडम् ॥ १॥

विघ्नान्धकारमित्रं शङ्करपुत्रं सरोजदलनेत्रम् ।
सिन्दूरारुणगात्रं सिन्धुरवक्त्रं नमाम्यहोरात्रम् ॥ २॥

गलद्दानगण्डं मिलद्भृङ्गषण्डं
चलच्चारुशुण्डं जगत्त्राणशौण्डम् ।
लसद्दन्तकाण्डं विपद्भङ्गचण्डं
शिवप्रेमपिण्डं भजे वक्रतुण्डम् ॥ ३॥

गणेश्वरमुपास्महे गजमुखं कृपासागरं
सुरासुरनमस्कृतं सुरवरं कुमाराग्रजम् ।
सुपाशसृणिमोदकस्फुटितदन्तहस्तोज्ज्वलं
शिवोद्भवमभीष्टदं श्रितततेस्सुसिद्धिप्रदम् ॥ ४॥

विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाट्
विघ्नव्यालकुलप्रमत्तगरुडो विघ्नेभपञ्चाननः ।
विघ्नोत्तुङ्गगिरिप्रभेदनपविर्विघ्नाब्धिकुम्भोद्भवः
विघ्नाघौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु नः ॥ ५॥

Sai Baba 11 Vachan in Marathi

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Sai Baba 11 Vachan in Marathi

Shirdi’s Jyache Lagtil Paay

शिर्डीस ज्याचे लागतील पाय । टळती अपाय सर्व त्याचे || १ ||

माझ्या समाधीची पायरी चढेल । दुःख हे हरेल सर्व त्याचे || २ ||

जरी हे शरीर गेलो भी टाकून । तरी भी धावेन भक्तासाठी || ३ ||

नवसास माझी पावेल समाधी । धरा दूढ बुद्धी माझ्या ठायी || ४ ||

नित्य भी जिवंत जाणा हेंची सत्य । नित्य ध्या प्रचीत अनुभवे || ५ ||

शरण मज आला आणि वाया गेला । दाखवा दाखवा ऐसा कोणी || ६ ||

जो जो मज भजे जैसा जैसा भावे । तैसा तैसा पावे मीही त्यासी || ७ ||

तुमचा भी भार वाहीन सर्वथा । नव्हे हें अन्यथा वचन माझे || ८ ||

जाणा येथे आहे सहाय्य सर्वास । मागे जे जे त्यास ते ते लाभे || ९ ||

माजा जो जाहला काया वाचा मनी । त्याचा मी ऋणी सर्वकाल || १० ||

साई म्हणे तोचि, तोचि झाला धन्य । झाला जो अनन्य माझ्या पायी || ११ ||

 

Aditya Hrudayam Stotra in English Lyrics

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Aditya Hrudayam Stotra in English

Tato Yuddha-Parishraantam Samare Cintayaa Sthitam |
Raavannam Ca-Agrato Drssttvaa Yuddhaaya Samupasthitam ||1||

Daivataish-Ca Sam-Aagamya Drassttum-Abhyaagato Rannam |
Upaagamya-Abraviid-Raamam-Agastyo Bhagavaan-Rssih ||2||

Raama Raama Mahaa-Baaho Shrnnu Guhyam Sanaatanam |
Yena Sarvaan-Ariin-Vatsa Samare Vijayissyasi ||3||

Aaditya-Hrdayam Punnyam Sarva-Shatru-Vinaashanam |
Jaya-avaham Japen-Nityam-Akssayyam Paramam Shivam ||4||

Sarva-Manggala-Maanggalyam Sarva-Paapa-Prannaashanam |
Cintaa-Shoka-Prashamanam-Aayur-Vardhanam-Uttamam ||5||

Rashmimantam Samudyantam Deva-Asura-Namaskrtam |
Puujayasva Vivasvantam Bhaaskaram Bhuvane shvaram ||6||

Sarva-Deva-atmako Hy-Essah Tejasvii Rashmi-Bhaavanah |
Essa Deva-Asura-Gannaan Lokaan Paati Gabhastibhih ||7||

Essa Brahmaa Ca Vissnnush-Ca Shivah Skandah Prajaapatih |
Maahendro Dhanadah Kaalo Yamas-Somo Hy-Apaam Patih ||8||

Pitaro Vasavas-Saadhyaah Hy-Ashvinau Maruto Manuh |
Vaayur-Vahnih Prajaa-Praannaa Rtu-Kartaa Prabhaa-Karah ||9||

Aadityah Savitaa Suuryah Khagah Puussaa Gabhastimaan |
Suvarnna-Sadrsho Bhaanur-Hirannya-Reto Divaakarah ||10||

Harid-Ashvas-Sahasra-Arcis-Sapta-Saptir-Mariicimaan |
Timiro nmathanash-Shambhus-Tvassttaa Maartaanndda Amshumaan ||11||

Hirannya-Garbhash-Shishiras-Tapano Bhaaskaro Ravih |
Agni-Garbho diteh Putrah Shangkhash-Shishira-Naashanah ||12||

Vyoma-Naathas-Tamo-Bhedii Rg-Yajus-Saama-Paaragah |
Ghana-Vrssttir-Apaam Mitro Vindhya-Viithii-Plavanggamah ||13||

Aatapii Mannddalii Mrtyuh Pinggalas-Sarva-Taapanah |
Kavir-Vishvo Mahaa-Tejaah Raktas-Sarva-Bhavo dbhavah ||14||

Nakssatra-Graha-Taaraannaam-Adhipo Vishva-Bhaavanah |
Tejasaam-Api Tejasvii Dvaadasha-atman-Namo stu Te ||15||

Namah Puurvaaya Giraye Pashcimaaya-Adraye Namah |
Jyotirgannaanaam Pataye Dina-Adhipataye Namah ||16||

Jayaaya Jaya-Bhadraaya Hary-Ashvaaya Namo Namah |
Namo Namas-Sahasra-Amsho Aadityaaya Namo Namah ||17||

Nama Ugraaya Viiraaya Saaranggaaya Namo Namah |
Namah Padma-Prabodhaaya Maartannddaaya Namo Namah ||18||

Brahme shaana-Acyute shaaya Suurya-aditya-Varcase |
Bhaasvate Sarva-Bhakssaaya Raudraaya Vapusse Namah ||19||

Tamo-Ghnaaya Hima-Ghnaaya Shatru-Ghnaaya-Amita-Atmane |
Krtaghna-Ghnaaya Devaaya Jyotissaam Pataye Namah ||20||

Tapta-Caamiikara-abhaaya Vahnaye Vishva-Karmanne |
Namas-Tamo-bhinighnaaya Rucaye Loka-Saakssinne ||21||

Naashayaty-Essa Vai Bhuutam Tad-Eva Srjati Prabhuh |
Paayaty-Essa Tapaty-Essa Varssaty-Essa Gabhastibhih ||22||

Essa Suptessu Jaagarti Bhuutessu Parinisstthitah |
Essa Cai va-Agnihotram Ca Phalam Cai va-Agnihotrinnaam ||23||

Vedaash-Ca Kratavash-Cai va Kratuunaam Phalam-Eva Ca |
Yaani Krtyaani Lokessu Sarva Essa Ravih Prabhuh ||24||

Enam-Aapatsu Krcchressu Kaantaaressu Bhayessu Ca |
Kiirtayan Purussah Kashcin-Na-Avasiidati Raaghava ||25||

Puujayasvai nam-Ekaagro Deva-Devam Jagat-Patim |
Etat-Tri-Gunnitam Japtvaa Yuddhessu Vijayissyasi ||26||

Asmin Kssanne Mahaa-Baaho Raavannam Tvam Vadhissyasi |
Evam-Uktvaa Tato-gastyo Jagaama Ca Yatha agatam ||27||

Etac-Chrutvaa Mahaa-Tejaah Nasstta-Shoko-bhavat-Tadaa |
Dhaarayaamaasa Supriito Raaghavah Prayata-atmavaan ||28||

Aadityam Prekssya Japtvaa Tu Param Harssam-Avaaptavaan |
Trir-Aacamya Shucir-Bhuutvaa Dhanur-Aadaaya Viiryavaan ||29||

Raavannam Prekssya Hrsstta-atmaa Yuddhaaya Sam-Upaagamat |
Sarva-Yatnena Mahataa Vadhe Tasya Dhrto-bhavat ||30||

Atha Ravir-Avadan-Niriikssya Raamam Mudita-Manaah Paramam Prahrssyamaannah |
Nishi-Cara-Pati-Samkssayam Viditvaa Sura-Ganna-Madhyagato Vacas-Tvareti ||31||

Shri Swami Samarth Tarak Mantra in Marathi

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Shri Swami Samarth Tarak Mantra in Marathi

॥ अक्कलकोटस्वामी समर्थ तारकमन्त्र ॥

गुरु ब्रम्हा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरा |
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवेनमहा ||

श्री गुरु दत्तात्रय स्वामी समर्थाय नमः

नि शंक हो,निर्भय हो मन रे
प्रचंड स्वामी बळ पाठीशी रे
अतर्क्य अवधूत हे स्मरण गामी
अशक्य ही शक्य करतील स्वामी ||1||

जिथे स्वामी पाय तिथे न्यून काय
स्वये भक्त प्रारब्ध घडवी ही माय
अद्नयेविना काळ ना नेई त्याना
परलोकिही ना भीती त्याला ||2||

उगास भितोसी भय हे पालू दे
जवळी उभा स्वामी शक्ति कलू दे
जगी जन्ममृत्यु असे खेळ ज्यांचा
नको घाबरू तू असे बाळ त्यांचा ||3||

होई जागा श्रधे सहित
कसा होशील त्याविन तू स्वामी भक्त
कितीसा दिला बोल त्यानीच हाथ
डगमगु नको स्वामी देतील साथ ||4||

विभूति नमन नाम ध्यानादि तीर्थ
स्वमिच या पञ्च प्रनाम्रुतात
हे तीर्थ आथाविरे प्रचिती
न सोडी स्वामी जे घेई हाथी ||5||
॥ भिऊ नकोस, मी तुझ्या पाठीशी आहे ॥

Shri Lakshmi Chalisa in Hindi

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Shri Lakshmi Chalisa in Hindi

दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास ।
मनो कामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस ॥

सिन्धु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारम्बार ।
ऋद्धि सिद्धि मङ्गलप्रदे नत शिर बारम्बार ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही । ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि ॥

तुम समान नहिं को‍ई उपकारी । सब विधि पुरबहु आस हमारी ॥

जै जै जगत जननि जगदम्बा । सबके तुमही हो स्वलम्बा ॥

तुम ही हो घट घट के वासी । विनती यही हमारी खासी ॥

जग जननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी । सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी । जगत जननि विनती सुन मोरी ॥

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । सङ्कट हरो हमारी माता ॥

क्षीर सिन्धु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी ॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रूप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हे‍उ अवधपुरी अवतारा ॥

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

अपनायो तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥

तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी । कहँ तक महिमा कहौं बखानी ॥

मन क्रम वचन करै सेवका‍ई । मन-इच्छित वाञ्छित फल पा‍ई ॥

तजि छल कपट और चतुरा‍ई । पूजहिं विविध भाँति मन ला‍ई ॥

और हाल मैं कहौं बुझा‍ई । जो यह पाठ करे मन ला‍ई ॥

ताको को‍ई कष्ट न हो‍ई । मन इच्छित फल पावै फल सो‍ई ॥

त्राहि-त्राहि जय दुःख निवारिणी । त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणि ॥

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे । इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै ॥

ताको को‍ई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥

पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना । अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शङ्का दिल में कभी न लावै ॥

पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ॥

बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं । उन सम को‍ई जग में नाहिं ॥

बहु विधि क्या मैं करौं बड़ा‍ई । लेय परीक्षा ध्यान लगा‍ई ॥

करि विश्वास करैं व्रत नेमा । होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा ॥

जय जय जय लक्ष्मी महारानी । सब में व्यापित जो गुण खानी ॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम को‍उ दयाल कहूँ नाहीं ॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै । सङ्कट काटि भक्ति मोहि दीजे ॥

भूल चूक करी क्षमा हमारी । दर्शन दीजै दशा निहारी ॥

बिन दरशन व्याकुल अधिकारी । तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी ॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में । सब जानत हो अपने मन में ॥

रूप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

कहि प्रकार मैं करौं बड़ा‍ई । ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिका‍ई ॥

रामदास अब कह‍इ पुकारी । करो दूर तुम विपति हमारी ॥

दोहा

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास ।
जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश ॥

रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर ।
मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर ॥

Ganesh Kavacham in Sanskrit

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Ganesh Kavacham in Sanskrit

गौर्युवाच ।

एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ 1 ॥

दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः ।
अतोस्य कण्ठे किञ्चित्त्यं रक्षां सम्बद्धुमर्हसि ॥ 2 ॥

मुनिरुवाच ।

ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् ।
द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्ताङ्गरागं विभुम् तुर्ये
तु द्विभुजं सिताङ्गरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ 3 ॥

विनायक श्शिखाम्पातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुन्दर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ 4 ॥

ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने बालचन्द्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥ 5 ॥

जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दन्तान्‌ रक्षतु दुर्मुखः ॥ 6 ॥

श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिन्तितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं पातु कण्ठं पातु गणाधिपः ॥ 7 ॥

स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तने विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ 8 ॥

धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः ।
लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ 9 ॥

गजक्रीडो जानु जङ्घो ऊरू मङ्गलकीर्तिमान् ।
एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥ 10 ॥

क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः ।
अङ्गुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥ 11 ॥

सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु ।
अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥ 12 ॥

आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ 13 ॥

दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ 14 ॥

कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनन्दनः ।
दिवाव्यादेकदन्त स्तु रात्रौ सन्ध्यासु यःविघ्नहृत् ॥ 15 ॥

राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः ।
पाशाङ्कुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥ 16 ॥

ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् ।
वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥ 17 ॥

सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा ।
कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥ 18 ॥

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कण्ठे धारयेत् सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥ 19 ॥

त्रिसन्ध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ 20 ॥

युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्ष स्तम्भ मोहन कर्मणि ॥ 21 ॥

सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ 22 ॥

एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥ 23 ॥

राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ 24 ॥

इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् ।
मुद्गलाय च ते नाथ माण्डव्याय महर्षये ॥ 25 ॥

मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ 26 ॥

अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् ।
राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव सम्भवाः ॥ 27 ॥

॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेश कवचं सम्पूर्णम् ॥

Why We Do Satyanarayan Pooja – श्रीसत्यनारायण पूजा कोणी , कुठे व कधी करावी?

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Why We Do Satyanarayan Pooja – पूजा कोणी , कुठे व कधी करावी?

सार्थ श्रीसत्यनारायण पूजा – कथा
पूजा कोणी , कुठे व कधी करावी? 

सत्यनारायण ही पूजा पती-पत्‍नी यांनी जोडीने करावी.
पुरुषांनी अगर मुलांनी केली तरी चालते . सत्यनारायण ही पूजा वर्षभरातील कोणत्याही दिवशी , कोणत्याही वेळेला केली तरी चालते यास मुहूर्त पाहण्याची जरूरी नाही तरी पण पौर्णिमा , संक्रांत , श्रावण आणि अधिक ( पुरुषोत्तम ) मासातील पूजा विशेष समजली जाते . कोणतेही नवीन कार्य सुरू करताना पूजा करतात . संकल्प करताना पूजा करतात . पूजा शक्यतो गोरज मुहूर्तावर करावी . पुजेसाठी पूजा होईपर्यंत उपवास करावा . प्रात : काळी पूजा केल्यास उत्तम .
पुजेला बसताना आपले मुख पुर्वेकडे करून पुजेला बसावे . दक्षिणेकडे मुख करुन बसू नये .
पुजा चालू असताना घरातील सर्व मंडळी , आप्तस्वकीय , मित्रमंडळी जर जिथे पूजा चालू आहे , तेथे थांबून मंत्र किंवा कथा ऎकतील तर यातून निर्माण होणार् ‍ या सात्विक लहरींचा त्यांना लाभ होऊन , सत्यनारायणाचे पुण्य मिळेल . या पुजेची कलियुगात नितांत गरज आहे .


पुजेला लागणारे साहित्य ( Satyanarayan Puja Samagri / Sahitya list in Marathi )

सत्यनारायणाचा फोटो, हळद, कुंकु, गुलाल, बुक्का प्रत्येकी ५० ग्रॅम. फूले, तुळशी (१०८ पाने) हार २, विड्याची पाने ५०, सुपार्‍या २७, नारळ २, खारीक ५, बदाम ५ हळकुंड ५, खोबर्‍याचा तुकडा, गुळाचा खडा, खोबरे वाटी १, खडीसाखर (१०० ग्रॅम), जानवी जोड, १ मीटर कापडाचे दोन पीस, पंचामृत (दही, दूध, तूप, मध, साखर) सुवासिक उदबत्ती, कापूर, सुट्टी रुपयांची नाणी ७, समया २, निरांजन १, तांदूळ १ किलो, गहू २५० ग्रॅम, केळीचे किंवा कर्दळीचे खूंट ४, शंख, घंटा, बाळकृष्णाची मूर्ती किंवा शाळीग्राम, अत्तराची बाटली, केळी १ डझन, तांब्याचे गडवे ३, ताम्हण २, पाट ४, चौरंग १, वेगवेगळी ५ फळे.
महाप्रसाद (Satyanarayan Pooja Prasad)

गव्हाचा रवा, साखर, साजूक तूप, प्रत्येकी सव्वा प्रमाणात सव्वा पावशेर अथवा सव्वा किलो प्रमाणात, पाव किलो पासून प्रसाद करावा त्यावर सव्वा केळी कुस्करुन घालावीत. याशिवाय महानैवेद्यासाठी गोड स्वयंपाक करावा.
सत्यनारायण पुजेची मांडणी (Satyanarayan Pooja Mandani)

स्वच्छ जागेवर शक्यतो पूर्व पश्‍चिम चौरंग मांडावा. त्या भोवती रांगोळी काढून त्यात गुलाल अथवा रंग भरावा. आवडीप्रमाणे रोषणाई करावी. चौरंगाला चारी बाजूंना केळीचे अथवा कर्दळीचे खुंट बांधावेत. चौरंगावर मागील बाजूस सत्यनारायणाचा फोटो उभा ठेवावा. चौरंगावर गहू किंवा तांदूळ पसरावेत, उजव्या बाजूला चौरंगावरच मुठभर तांदूळ ठेवून त्यावर गणपतीचे प्रतिक म्हणून पांढरी सुपारी ठेवावी. मधल्या तांदूळ किंवा गव्हावर पाण्याने भरलेला कलश ठेवावा त्यात गंध, फुले, अक्षता, सुपारी, दुर्वा व एक नाणे, आंब्याचा डहाळा ठेवावा, त्यावर विड्याची ५ पाने ठेवावीत. कलशावर हळदी कुंकवाचे पट्टे ओढावेत, छोटे स्वस्तिक चिन्ह काढावे. त्या कलशावर ताम्हण ठेवावे. ताम्हणात तांदुळ किंवा गहू पूर्ण भरावेत. मध्यभागी एक सुपारी मांडावी. (वरुणाचे प्रतिक) आठ दिशांना आठ लोक पालांच्या सुपार्‍या मांडाव्यात.
लोकपाल येणेप्रंमाणे – पूर्वेस इंद्र , पश् ‍ चिमेस वरुण , दक्षिणेस यम , उत्तरेस सोम , आग्नेयेस अग्नि , नैऋत्येस – निश्वति , वायव्येस – वायु , ईशान्येस – इशान ; त्याचप्रमाणे नवग्रहांच्या सुपार् ‍ या मांडाव्यात . पुजेसाठी बाळकृष्ण अथवा शाळी ग्राम घ्यावा . शाळीग्राम असेल तर अक्षता वाहू नयेत , तुळशीपत्र वहावे . बाळकृष्णाला अक्षता वहाव्यात . चौरंगावर डावीकडे पाच विडे मांडावेत . प्रत्येक विड्यावर एक हळकुंड आणि खारीक ठेवावे . डावीकडे समई ठेवावी .
तांदूळावर ठेवलेल्या सुपारी गणपती मागे शंख ठेवावा .
पूजन प्रारंभ
– सुहासिनीने हळद-कुंकू लावावे, यजमानानी पुजेला बसल्यानंतर विडे घेऊन पळीत पाणी घ्यावे. विड्याच्या दोन पानावर अक्षता, पैसा व सुपारी ठेवावी. आपल्या कुलदैवतासमोर विडा ठेवून त्यावर एक पळी पाणी सोडावे देवाला नमस्कार करावा. घरातील थोर मंडळींना नमस्कार करावा, गुरुजींना नमस्कार करुन आपापल्या आसनावर बसावे आणि पुजेला प्रारंभ करावा.

(Satyanarayan Pooja Mantra and Vidhi Procedure)
द्विराचम्य प्राणायाम कृत्वा 

पुढे दिलेल्या २४ नावांपैकी पहिल्या तीन नावांचा उच्चार करून प्रत्येक नावाच्या शेवटी संध्येच्या पळीने उजव्या हातावर पाणी घेऊन आचमन करावे. (आचमन करतेवेळी तोंडाने आवाज करू नये.) चौथ्या नावाचा उच्चार करून संध्येच्या पळीने उजव्या हातावर पाणी घेऊन ताम्हनात सोडावे. याप्रमाणे दोन वेळा करावे.
नंतर नावाचा उच्चार करून प्रत्येक वेळी नमस्कार करावा. सर्व नावे संपल्यावर प्राणायाम करावा.
ॐ केशवाय नम: ।
ॐ नारायणाय नम: ।
ॐ माधवाय नम: ।
ॐ गोविंदाय नम: ।
ॐ विष्णवे नम: ।
ॐ मधुसूदनाय नम: ।
ॐ त्रिविक्रमाय नम: ।
ॐ वामनाय नम: ।
ॐ श्रीधराय नम: ।
ॐ ह्रषीकेशाय नम: ।
ॐ पद्मनाभाय नम: ।
ॐ दामोदराय नम: ।
ॐ संकर्षणाय नम: ।
ॐ वासुदेवाय नम: ।
ॐ प्रद्युम्नाय नम: ।
ॐ अनिरुद्धाय नम: ।
ॐ पुरुषोत्तमाय नम: ।
ॐ अधोक्षजाय नम: ।
ॐ नारसिंहाय नम: ।
ॐ अच्युताय नम: ।
ॐ जनार्दनाय नम: ।
ॐ उपेन्द्राय नम: ।
ॐ हरये नम: ।
ॐ श्रीकृष्णाय नम: ।
प्रणवस्य परब्रह्म ऋषि: ।
परमात्मा देवता दैवी गायत्री च्छंद: ।
प्राणायामे विनियोगे: ।
ॐ भू: ॐ भुव: ॐ स्व: ॐ मह:
ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम्।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो न: प्रचोदयात्।
ॐ आपो ज्योति: रसोमृतं ब्रह्म भुर्भुव: स्वरोम्।
धियो यो न: प्रचोदयात्।
ॐ आपो ज्योति: रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुव: स्वरोम्।

यानंतर आपला उजवा हात उजव्या कानाला व डाव्या कानाला लावावा.
येथून पुढे ध्यान करावे. ते असे की हातात अक्षता घेऊन दोन्ही हात जोडावेत. व आपली दृष्टी आपल्यासमोरील देवाकडे लावावी.
ॐ श्रीमन्महागणाधिपतये नम: । इष्टदेवताभ्यो नम: । कुलदेवताभ्यो नम: । ग्रामदेवताभ्यो नम: ।
स्थानदेवताभ्योनम: । वास्तुदेवताभ्यो नम: । श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नम: । सर्वेभो देवेभो नमो नम: ।
सर्वभ्यो ब्राह्मणेभो नमो नम: । निर्विघ्नमस्तु । सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णक: ।
लंबोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिप: । धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजानन: । द्वादशैतानि नामानि य: पठेच्छृणुयादपि ।
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ॥ संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।
शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशांतये ।
सर्व मंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोस्तुऽते ।
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषामंगलम्। येषां ह्रदिस्थो भगवान्‍ मंगलायतनं हरि: ।
तदेवं लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेंऽघ्रियुगं स्मरामि ।
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजय: । येषामिंदीरवश्यामो ह्रदयस्थो जनार्दन: ।
विनायकं गुरूं भानुं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरान्। सरस्वतीं प्रणौम्यादौ सर्वकार्यार्थसिद्धये ।
अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो य सुरासुरै: । सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नम: ।
सर्वेष्वारब्धकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वरा: । देवा दिशंतु न: सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दना: ।

श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपदे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वंतरे कलियुगे प्रथमचरने भरतवर्षे भरतखंडे जंबुद्वीपे दंडकारण्ये देशे गोदावर्या: दक्षिणे तीरे शालिवाहनशके अमुक नाम संवत्सरे अमुकायने अमुकऋतौ अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकदिवसनक्षत्रे विष्णुयोगे विष्णुकरणे अमुकस्थिते वर्तमाने चंद्रे अमुकस्थिते श्रीसूर्ये अमुकस्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु शुभनामयोगे शुभकरणे एवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ।

(येथे पूजा करणाराने स्वत: म्हणावे)
मम आत्मन: श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं अस्माकं सुकुटूंबानां सपरिवाराणां क्षेमस्थौर्यआयुरारोग्यऎश्वर्यप्राप्त्यर्थं
सकलपीडापरिहारार्थ मनेप्सितसकलमनोरथसिद्ध्यर्थं ।
श्री सत्यनारायणदेवताप्रीत्यर्थं यथाज्ञानेन यथामिलोतोपचारद्रव्यै: ध्यानावाहनादिषोडशोपचारपूजनमहं करिष्ये ।

(उजव्या हातात पाणी घेऊन ताम्हनात सोडावे.)
तत्रादौ निर्विघ्नतासिद्ध्यर्थं महागणपतिपूजनं करिष्ये । तथा शरीरशुद्ध्यर्थं षडङ्गन्यास कलशशंखघंटापूजनं वरूणादिदेवतास्थापनार्थं कलशस्थापनं वरुणादिदेवतापूजनं च करिष्ये ।

(उजव्या हातात पाणी घेऊन ताम्हनात सोडावे.) तांदळावर सुपारी ठेवून तोच गणपती समजून पुढील सर्व उपचार वाहावे.
गणानां त्वा शौनको गृत्समदो गणपतिर्जगती गणपत्यवाहने विनियोग: ।
ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ न: शृण्वन्नूतिभि: सीद सादनं ॥
वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥१॥

असे म्हणून गणपतीवर अक्षता वाहाव्या व पुढील वाक्य म्हणावे.
असिमन्पूगीफले ऋद्धिबुद्धिसहितं महागणपतिं सांगं सपारिवारं सायुधं सशक्तिकं आवाहयामि ।

(आवाहनार्थ अक्षता वाहाव्या.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतिं ध्यायामि ।
(गणपतीचे ध्यान करावे.)
ॐ भूर्भुव: स्व: श्रीमहागणपतये नम: आसनार्थे अक्षतान्समर्पयामि ।
(अक्षता वाहाव्या.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: पाद्यं समर्पयामि

(पळीभर पाणी घालावे.)
ॐ भूर्भूंव: स्व: महागणपतये नम: । अर्घ्यं समर्पयामि ।

(गंधाक्षतायुक्त पाणी घालावे.)
ॐ भूर्भुंव: स्व: महागणपतये नम:। आचमनीयं समर्पयामि ।
(पळीभर पाणी घालावे.)
ॐ भूर्भुंव: स्व: महागणपतये नम: । स्नानं समर्पयामि ।

(पळीभर पाणी घालावे.)
महागणपतये नम: सुप्रतिष्ठितमस्तु । ॐभूर्भुंव: स्व: महागणपतये नम: । वस्त्रोपवस्त्रार्थे कार्पासवस्त्रे समर्पयामि
(वरील मंत्राने कापसाची दोन वस्त्रे वाहावी.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।

(जानवे वाहावे)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । विलेपनार्थे चंदनं समर्पयामि ।
(गणपतीला गंध लावावे.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: अलंकारार्थे अक्षतान्समर्पयामि ।
(अक्षता वाहाव्या.)
ऋद्धिसिद्धिभ्यां नम: । हरिद्रां कुंकुमं सौभाग्यद्रव्यं समर्पयामि ।
(हळदकुंकू वाहावे.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । सिंदूरं परिमलद्रव्याणि च समर्पयामि ।
(या मंत्राने शेंदूर, अष्टगंध व अरगजा इत्यादी सुवासिक द्रव्ये वाहावी.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । कालोद्भवपुष्पणि दूर्वाकुरांश्च समर्पयामि ।

(गणपतीला तांबडी फुले व दुर्वा वाहाव्यात. )
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । धूपं दीपं च समर्पयामि ।
(या मंत्राने उदबत्ती ओवाळून नंतर गणपतीला निरांजन ओवाळावे.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । नैवेद्यार्थे गुडखाद्य नैवेद्यं समर्पयामि ।

(पाण्याने चौकोनी मंडल करून त्यावर गूळखोबरे ठेवून त्याचा नैवेद्य पुढील मंत्राने गणपतीला दाखवावा.)
ॐ प्राणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा ॐ व्यानाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा ॐ समानाय स्वाहा ।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा । नैवेद्यमध्येपानीयं समर्पयामि ।
(एक पळीभर पाणी ताम्हनात सोडावे व वरील मंत्राने पुन्हा नैवेद्य दाखवावा.)
उत्तरापोशनं समर्पयामि । हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि । मुखप्रक्षालनं समर्पयामि ।

(असे म्हणून तीन पळ्या पाणी ताम्हनात सोडावे.)
मुखवासार्थे पूगीफलतांबूलं सुवर्णनिष्क्रयदक्षिणां समर्पयामि ॥

या मंत्राने विडा, सुपारी व दक्षिणा ठेवून त्यावर पाणी घालवे.)
ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: । मंत्रंपुष्पं समर्पयामि ।

गणपतीला फूल वाहावे व हात जोडून पुढील मंत्रांनी प्रार्थना करावी.
नमस्करोमि । कार्यं मे सिद्धिमायान्तु प्रसन्ने त्वयि धातरि ।
विघ्नानि नाशमायान्तु सर्वाणि सुरनायक।ॐ भूर्भुव: स्व: महागणपतये नम: प्रार्थनां समर्पयामि ।
अनेन कृतपूजनेन महागणपति: प्रीयताम ॥

(असे म्हणून उदक सोडावे.) यापुढील मंत्र आसनमांडी घालून (डाव्या गुडघ्यावर उजवा पाय ठेवावा, व उजव्या गुडघ्यावर डावा हात उताणा ठेवावा.) उजव्या हातात पाणी घेऊन ते आपल्या मस्तकाभोवती फिरवून डाव्या हातात घालावे व त्यावर उजवा हात पालथा (उपडा) ठेवावा. (याला आसनबंध म्हणतात.)
पृथ्वीति मंत्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषि: कूर्मो देवता सुतलं छंद: आसने विनियोग: ।
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ॥
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‍ ॥ इति आसनं विधाय ।
ॐ अपसर्पंतु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिता: । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ॥
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा: सर्वतो दिशम्‍ ॥ सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥
इति भूतोत्सादनं कृत्वा अथ षडड्‍नन्यास: ।

ॐ भूर्भुव: स्व: ह्रदयाय नम: ।

(छातीला उजवा हात लावावा.)
ॐ भूर्भुव: स्व: शिरसे स्वाहा ।

(मस्तकाला हात लावावा.)
ॐ भूर्भुव: स्व: शिखायै वषट्।

(शेंडीला हात लावावा.)
ॐ भूर्भुव: स्व: कवचाय हुम्।

(हातांची ओंजळ करून छातीकडे तीन वेळा फिरवावी.)

ॐ भूर्भुव: स्व: नेत्रत्रयाय वोषट्।

(डोळे व भुवईच्या मध्ये हात लावावा.)
ॐ भूर्भुव: स्व: अस्त्राय फट्।

(टाळी वाजवावी) इति दिग्बंध: ।
अथ कलशशंखघंटापूजनम्। कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित: ।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता: । कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा ।
ऋग्वेदोथ यजुर्वेद: सामवेदोह्यथवर्ण: । अंगैश्च सहिता सर्वे कलशं तु समाश्रिता: ।
अत्र गायत्रीसावित्री शांति: पुष्टोकरी तथा । आयांतु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारका: ।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ।
कलशाय नम: । सर्वोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ॥ धेनुमुद्रां प्रदर्श्य ।

(आपल्या डाव्या बाजूस पुजेसाठी भरून घेतलेला जो तांब्या असेल त्याला गंध, अक्षता व फूल वाहावे. याला कलशपूजन म्हणतात.)
ॐ शंखादौ चंद्रदैवत्यं कुक्षौ वरुणदेवता । पृष्ठे प्रजापति विद्यादग्रे गंगासरस्वती ॥
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत: करे ॥ नमित: सर्वदेवैश्च पांचजन्य नमोऽस्तु ते ।
ॐ पांचजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि । तन्न: शंख: प्रचोदयात्।

चौरंगावर आपल्या उजव्या बाजूस ठेविलेला शंख हातात घेऊन स्नान घालावे व पाणी भरून ठेवावा आणि गंधफूल वाहावे. )
शंखाय नम: । गंधपुष्पं समर्पयामि ॥
आगमनार्थं तु दैवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्। कुर्वे घंटारवं तत्र देवताहवानलक्षणम्।

(आपल्या डाव्या बाजूस ठेविलेल्या घंटेला उजव्या हातात घेऊन स्नान घालावे व वस्त्राने पुसून जाग्यावर ठेवावी.)
घंटायै नम: । गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।

(घंटा वाजवावी.)
हरिद्रां कुंकुमं सौभाग्यद्रव्यं समर्पयामि ।
तथा दीपदेवताभ्यो नम: गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।
हरिद्रां कुंकुमं सौभाग्यद्रव्यं समर्पयामि ।

(असे करून पुढील प्रार्थना म्हणावी.)
भो दीप ब्रह्मरूपस्त्यं ज्योतिषां प्रभुरव्यय । यावत्पूजा समाप्ति: स्यात्तावत्त्वं सुस्थिरो भव ।

(दिव्याला नमस्कार करावा व गंध, फूल, हळदकुंकू वाहावे.)
अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । य: स्मरेत्पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर: शुचि: ।

(असे म्हणून कलशातील पाणी पळीत घेऊन तुळशीपत्राने सर्व पूजासाहित्यावर प्रोक्षण करून नंतर आपल्या स्वत:वर प्रोक्षण करावे.)
आत्मानं प्रोक्ष्य पूजाद्रव्याणि च संप्रोक्षेत्।
तुंडलोपरि आ कलशेषु धावति पवित्रे परि षिच्यते ।
उक्थैर्यज्ञेषु वर्धते । इति कलशं संस्थाप्य ।

(चौरंगावरील तांदळावर कलश (तांब्या) ठेवावा.)
कलशे जलं निक्षिप्य तत्र गंधाक्षतपुष्पदूर्वांकुरान्आम्रपल्लवं पूगीफलं हिरण्यं च निक्षिप्य ।
(कलशात पाणी, गंधफूल, अक्षता, दूर्वा, आंब्याचा डहाळा, सुपारी व पैसा घालावा.)
ॐ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरापत । वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जं शतक्रतो । इति कलशे पूर्णपात्रं निधाय ।

(कलशावर पूर्णपात्र म्हणजे ताम्हन ठेवून मधल्या सुपारीवर वरुणाचे आवाहन करावे व पूर्वेपासून आठ दिशांना नाममंत्रांनी अष्टलोकपालांचे आवाहन करून ग्रहांचेही आवाहन करावे.)
पूगीफले वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकं आवाहयामि । पूर्वादिदिक्षु

(पूर्वेपासून आठ दिशांना आवाहन करावे.)
ॐ इंद्राय नम: इन्द्रं आवाहयामि ।
ॐ अग्नये नम: अग्निं आवाहयामि ।
ॐ यमाय नम: यमं आवाहयामि ।
ॐ निऋतये नम: निऋतिं आवाहयामि ।
ॐ वरुणाय नम: वरुणंआवाहयामि ।
ॐ वायवे नम: वायुंआवाहयामि ।
ॐ सोमाय नम: सोमंआवाहयामि ।
ॐ ईशानाय नम: ईशानआवाहयामि ।
इति दिक्पालान्आवाह्य तत्रैव पूर्णपात्रेपूगीफले अक्षतपुंजे व अक्षतान् समर्पयामि ।

(म्हणजे ताम्हनातीलसुपारीवर किंवा तांदळाच्य़ा पुंजावर अक्षता वाहाव्या.)
ॐ सुर्याय नम: सूर्यंआवाहयामि ।
ॐ सोमाय नम: सोमंआवाहयामि ।
ॐ भौमाय नम: भौमंआवाहयामि ।
ॐ बुधाय नम: बुधंआवाहयामि ।
ॐ बृहस्पतये नम: बृहस्पतिंआवाहयामि ।
ॐ शुक्राय नम: शुक्रंआवाहयामि ।
ॐ शनैश्चराय नम: शनैश्चरंआवाहयामि ।
ॐ राहवे नम: राहुंआवाहयामि ।
ॐ केतवे नम: केतुंआवाहयामि ।
इति नवग्रहान्आवाह्य ।

(येणेप्रमाणे आवाहन करून सर्व सुपार्‍यांवर क्रमाक्रमाने गंध, अक्षता, फुले वाहावी. हळदकुंकू, धूपदीप दाखवून नैवेद्य दाखवावा व नमस्कार करून उदक सोडावे.)
ॐ भूर्भुव; स्व: वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सर्वोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।
हरिद्रां कुंकुमं सौभाग्यद्रव्यं समर्पयामि ।
धूपं समर्पयामि । दिपं दर्शयामि ।
नैवेद्यं समर्पयामि । नमस्करोमि ।
अनेन कृतपूजनेन वरुणाद्यावाहितदेवेता: प्रीयंताम्।

हातात उदक (पाणी) घेऊन ताम्हनात सोडावे.
कलशस्य सुखे विष्णु : या मंत्राने कलशाची प्रार्थना करावी.
अथ ध्यानम्। ध्यायेत्सत्य गुणातीतं गुणत्रयसमन्वितम्। लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभाभरणं हरिम्।।
नीलवर्णं पीतवासं श्रीवत्सपदभूषितम्। गोविंदं गोकुलानंदं ब्रह्माचैरपि पूजितम्। इति सत्यनारायणं ध्यायामि ।

या मंत्राने ध्यान करावे.
हरि: ॐ सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष; सहस्त्रापात्। स भूर्मि विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
आगच्छ देवदेवेश तेजोराशे जगत्पते । क्रियमाणां मया पूजां गृहण सुरसत्तम ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: आवाहनं समर्पयामि ।

(या मंत्राने आवाहनदर्शक देवावर अक्षता वाहाव्या. शाळिग्राम असल्यास तुळशीपत्र वाहावे.)
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भुतं यच्च भव्यं । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
नानारत्‍नसमायुक्तं कार्तस्वरविभूषितम्। आसनं देवदेवेश प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: । आसनार्थे अक्षतां समर्पयामि ।

(देवाच्या आसनाच्या ठिकाणी अक्षता वाहाव्या.)
ॐ एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुष: । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
पाद्यं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो: । भक्त्या समर्पितं देव लोकनाथ नमोऽस्तु ते ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: । पाद्यं समर्पयामि

(देवाच्या पायांवर पाणी घालावे.)
ॐ त्रिपार्दूर्ध्व उदैत्पुरुष: पादोऽस्येहाभवत्पुन: । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ।
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते धरणीधर । नमस्ते जगदाधार अर्घ्यं न: प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणाय सांङ्गाय सपरिवाराय नम: । अर्घ्यं समर्पयामि ।

(असे म्हणून पळीभर पाण्यात गंध, अक्षता, फूल घालून देवावर त्या पाण्याने अर्घ्य घालावे.)
ॐ तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुष: । स जोतो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुर: ॥
कर्पूरवासितं तोयं मंदाकिन्या: सामाह्रतम्। आचम्यतां जगन्नाथ मया दत्तं हि भक्तित: ।
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: । आचमनीयं समर्पयामि ।

(देवावर संध्येच्या पळीने एक पळीभर पाणी घालावे.)
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसंतो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्म: शरद्धवि: ॥
गङ्गासरस्वतीरेवापयोष्णीनिर्मदाजलै: । स्नापितोऽसि मया देव शांतिं कुरुष्व मे ।
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: । स्नानीयं समर्पयामि ।

(संध्येच्या पळीने पाणी घालावे.)
अथ पंचामृतस्नानाम्। ॐ आप्यायस्व समेतु ते विश्वत: सोम वृष्ण्यं । भवा वाजस्य संगथे ॥
कामधेनो: समुद्भुतं देवर्षिपितृतृप्तिदम्। पयो ददामि देवेश स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।
ॐ श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: । पय:स्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।

(देवाला दूध घालावे. नंतर साधे पाणी घालावे.)
ॐ दधिक्रोव्णो अकरिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिन: । सुरभि नो मुखा करत्प्रण आयूंषि तारिषत्॥
चंद्रमंडलसंकाशं सर्वदेवप्रियं दधि । स्नानार्थं ते मया दत्तं प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्।
ॐ सत्यनारायणायसांङ्गाय सपरिवाराय नम: । दधिस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।

(देवाला दह्याने स्नान घालावे. नंतर शुद्धोदक (साधे पाणी) घालावे.)
ॐ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतमवस्य धाम ।
अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहकृतं वृषण वक्षि हव्यं ॥
आज्यं सुराणामाहार आज्यं यज्ञे प्रतिष्टितम्आज्यं पवित्रं परमं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणाय सांङ्गाय सपरिवाराय नम: ।
घृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।

(देवाला तूप घालावे नंतर साधे पाणी घालावे.)
ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव: । माध्वीर्ण: संत्वौषधी: ॥
मधु नक्तमुतोषसि मधुमत्पार्थिवँ रज: । मधु द्यौरस्तु न: पिता मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्य: । माध्वीर्गावो भवंतु न: ॥
सर्वौषधिसमुत्पन्नं पीयूषसदृशं मधु । स्नानार्थं ते प्रयच्छामि गृहाण परमेश्वर ।
श्रीसत्यनारायणाय सांङ्गाय सपरिवाराय नम: ।मधुस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि॥

(देवाला मधाने स्नान घालावे, नंतर साधे पाणी घालावे.)
ॐ स्वादु: पवस्य दिव्याय जन्मने स्वादुरिंद्राय सुहवीतुनाम्ने ।
स्वादुर्मित्राय वरुणाय वायवे बृहस्पतये मधुमाँ अदाभ्य: । इक्षुदंडसमुद्भुतदिव्यशर्करया हरिम्।
स्नापयामि सदा भक्त्या प्रीतो भव सुरेश्वर ।
श्रीसत्यनारायणाय सांङ्गाय सपरिवाराय नम: । शर्करास्नानं समर्पयामि ।

(देवाला साखरेने स्नान घालावे, नंतर साधे पाणी घालावे.)
ॐ गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानांतामिहोप ह्वये श्रियम्॥
कर्पूरैलासमायुक्तं सुगंधिद्र्व्यसंयुतम्गंधोदकं मया दत्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणाय सांङ्गाय सपरिवाराय नम: । गंधोदकस्नानं समर्पयामि ।

(संध्येच्या पळीत पाणी व गंध घालून ते पाणी घालावे, नंतर साधे पाणी घालावे.)
श्रीसत्यनारायणाय नम: सर्वोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पं तुलसीपत्रं समर्पयामि । हरिद्रां कुंकुमं समर्पयामि ।

(हे मंत्र म्हणून देवाला गंध, अक्षता, तुळशीपत्र व हळदकुंकू वाहावे.)
श्रीसत्यनारायणाय सांङ्गाय सपरिवाराय नम: । धूपं समर्पयामि ।
दीपं दर्शयामि । नैवेद्यार्थे पंचामृतशेषनैवेद्यं च समर्पयामि ।

(वरील मंत्र म्हणून उदबत्ती ओवाळावी, निरांजन ओवाळावे. पंचामृताच्या वाटीभोवती पाणी फिरवावे व नंतर नैवेद्य दाखवावा.)
ॐ प्राणाय स्वाहा ।ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा।
ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ।
उत्तरापोशनंहस्तमुखप्रक्षालनं समर्पयामि । मुखवासार्थे पूगीफलतांबूलं सुवर्णनिष्क्रयदक्षिणां समर्पयामि ।
श्रीसत्यनारायणाय नम:। मंत्रपुष्पं समर्पयामि । नमस्करोमि

(प्रत्येक मंत्र म्हणून पाणी सोडावे. विड्याच्या दोन पानांवर पैसा-सुपारी ठेवून त्यावर पाणी घालावे. साध्या पाण्याचे उदक सोडावे. नंतर मंत्रपुष्प म्हणून एक फूल व अक्षता वाहाव्या.)
अनेन कृतपूर्वपूजनेन तेन श्रीसत्यनारायण साङ्ग: सपरिवार: प्रीयताय्।
उत्तरे निर्माल्यं विसृज्य अभिषेकं कुर्यात्।

असे म्हणून देवावर वाहिलेली पूर्वीची फुले काढून उत्तरेकडे ठेवावी आणि महाभिषेकाला (पुरुषसुक्ताने किंवा श्रीसूक्ताने) सुरुवात करावी.
ॐ देवस्य त्वा सवितु: प्रसवेऽश्विनौर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नेस्तेजसा सूर्यस्य वर्चसेंद्र:स्येंद्रियेणाभिषिंचामि ।

सुरास्त्वामभीषिञ्चिन्तु ब्रह्माविष्णुमहेश्वरा: ।
वासुदेवो जगन्नाथस्तथा सङ्कर्षणो विभु: ॥१॥
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते ।
आखण्डलोऽग्निर्भगवान्यमो वै निऋतिस्तथा ॥ २ ॥
वरुण: पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिव: ।
ब्रह्मणा सहिता: सर्वे दिक्पाल: पान्तु ते सदा ॥ ३ ॥
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टि: श्रद्धा क्रिया मति: ।
बुद्धिर्लज्जा वपु: शान्ति: कान्तिस्तुष्टिश्च मातर: ॥४॥
एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु देवपत्‍न्य: समागता: ॥
आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधजीवसितार्कजा: ॥५॥
ग्रहास्त्वामाभिषिञ्चन्‍तु राहु: केतुश्च तर्पिता: ॥
देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा: ॥६॥
ऋषयो मनवो गावो देवमातर एव च ।
देवपत्‍न्यो द्रुमा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणा: ॥७॥
अस्त्राणी सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च ।
औषधानि च रत्‍नानि कालस्यावयवाश्च ये ॥८॥
सरित: सागरा: शैलास्तीर्थानि जलदा नदा: ।
एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये ॥९॥
बलाय श्रियैय यशसेऽन्नाद्दाय ॐ भूर्भुव: स्व: । अमृताभिषेकोऽस्तु शान्ति: पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ॥

(असे म्हणून देवावर पाणी घालावे.)
श्रीसत्यनारायणाय नम: अभिषेकस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।

(अभिषेक झाल्यानंतर शुद्धोदक घालावे.)
श्रीसत्यनारायणाय नम: अभिषेकस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।

(अभिषेक झाल्यानंतर शुद्धोदक घालावे.)
अनन्तरं शंखोदकस्नानं कृत्वा अभ्यंगस्नानं कुर्यात्। काश्मिरागरुकस्तूरीकर्पूरमलयान्वितम्।
उद्बर्तनं मया दत्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्। मांगलिकस्नानं उष्णोदकस्नानं कुर्यात्।

(नंतर शंखोदक घालून अभ्यंग स्नान म्हणजे सुवासिक तेल, अत्तर वगैरे लावून गरम पाण्याने स्नान घालावे.)
तत; श्रीसत्यनारायणं पूर्णपात्रे प्रतिष्ठाय। (नंतर देव वस्त्राने पुसून ताम्हनात ठेवावा.)
ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रत: । तेन देवा अजयंत साध्या ऋषयश्च ये ।
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे । मयोपपादिते तुभ्यं वाससि प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: । वस्त्रं समर्पयामि ।

(असे म्हणून देवाला कापसाचे वस्त्र किंवा प्रत्यक्ष वस्त्र वाहावे.)
ॐ तस्माद्यज्ञात्सवर्हुत: संभृतं पृषदाज्यं । पशून्तांश्चके वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये ॥
देव नमस्तेऽस्तु त्राहिं मां भवसागरात्। ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम ।
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: । वस्त्रोपवस्त्रार्थे यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।

(देवाला जानवे घालावे.)
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे । छंदासि जज्ञिरे तस्माद्यजु:स्तस्मादजयायत ॥
श्रीखंडं चन्दनं दिव्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यतम्।
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: ।

चंदनं समर्पयामि (देवाला वरील मंत्रांनीं गंध लावावे.)
अक्षतास्तंडुला: शुभ्रा: कुंकुमेन विराजिता: । मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: । अक्षतान्समर्पयामि ।

(वरील मंत्राने देवाला अक्षता वाहाव्या.)
हरिद्रास्वर्णवर्णाभा सर्वसौभाग्यदायिनी । सर्वालंकारमुख्या हि देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: हरिद्रा समर्पयामि ।

(या मंत्राने हळद वाहावी.)
हरिद्राचूर्णसंयुक्तं कुंकुमं कामदायकम्। वस्त्रालंकरणं सर्वं देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: । कुंकुमं समर्पयामि ।

(या मंत्राने कुंकू वाहावे.)
कज्जलं कामदं रम्यं कामिनीकामसंभवम्। नेत्रयोर्भूषणार्थाय कज्जलं प्रतिगृह्यताम्।

(एका पानावर तुपाचे पुसट बोट लावून ते पान समईच्या ज्योतीवर धरावे, व जे काजळ मिळेल ते देवाला लावावे.)
श्रीदेव्यै नम: । कज्जलं समर्पयामि । उदितारुणसंकार्श जपाकुसुमसन्निभम्।
सीमन्तभूषणार्थाय सिंदूरं प्रतिगृह्यताम्। श्रीदेव्यै नम: । सिंदूरं समर्पयामि ।

(शेंदूर वाहावा.)
मांगल्यतंतुमणिभिर्मुक्ताफलविराजितम्। कंठस्य भूषणार्थाय कंठसूत्रं प्रगृह्यताम्।

(या मंत्राने मंगळसूत्र वाहावे.)
श्रीदेव्यै नम: कंठसूत्रं समर्पयामि । काचस्य निर्मितं दिव्यं कंकणं च सुरेश्वरि ।
हस्तालंकरणार्थाय कंकणं प्रतिगृह्यताम्। श्रीदेव्यै नम: । कंकणं समर्पयामि ।

(या मंत्राने बांगड्या वाहाव्या.)
ज्योत्सनापते नमस्तुभ्यं नमस्ते विश्वरूपिणे । नानापरिमलद्र्व्याणी गृहाण परमेश्वर।
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: । नाना परिमलद्रव्याणी समर्पयामि ।

(असे म्हणून देवाला अर्गजा, अष्टगंध इत्यादी सुगंधी द्रव्ये वाहावी.) ।
ॐ तस्मादश्वा अजायत ये के चोभयादत: । गावोह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावय: ।
माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै प्रभो । मया ह्रतानि पूजार्थं पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम्।
सेवंतिकाबकुलचंपकपाटलाब्जै पुन्नागजातिकरवीररसाल पुष्पै: ॥
बिल्वप्रवालतुलसीदलमालतीभि: । त्वां पूजयामि जगदीश्वर मे प्रसीद ।
श्रीसत्यनारायणायसाङ्गाय सपरिवाराय नम: । विविधपुष्पाणि समर्पयामि ।

(सत्यनारायणाला आवडती फुले चमेली, मोगरा, केवडा, चाफा, जाई, कण्हेर, अशोक, बकुल, तगर, गुलाब व इतर सुवासिक फुले आणावी. तुळस सर्वांत अधिक प्रिय.)
सहस्त्रनाममंत्रै: सहस्त्रतुलसीपत्रसमर्पणं कार्यम्। अलाभे अष्टोत्तरशततुलसीदलसमर्पण कार्यम्।

सत्यनारायणाला हजार तुळशी वाहाव्या. हजार न मिळतील तर एकशेआठ वाहाव्या. पुढील प्रत्येक नामाबरोबर ‘नम:’ असा उच्चार करून देवाला १०८ वेळा तुळशी वाहाव्या.
॥अथ ध्यानम्॥ शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं । विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्घ्यानगम्यं वंदे विष्णु: भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्‍ ॥ १ ॥ इति ध्यानम्॥

श्रीकृष्णाय नम: । कमलनाथाय, वासुदेवाय, सनातनाय, वसुदेवात्मजाय, पुण्याय, लीलामानुषविग्रहाय,
श्रीवत्सकौस्तुभधराय, यशोदावत्सलाय, हरये, चतुर्भुजात्तचक्रासिगदाशंखाद्यायुधाय, देवकीनंदनाय,
श्रीशाय, नंदगोपप्रियात्मजाय, यमुनावेगसंहारिणे, बलभद्रप्रियानुजाय, पूतनाजीवितहराय, शकटासुरभंजनाय,
नंदव्रजजनानंदाय, सच्चिदानंविग्रहाय, नवनीतविलिप्तांगाय, नवनीतनटाय, अनाघाय,
नवनीत एवाहाराय मुचकुंदप्रसादकाय, षोडशस्त्रीसहस्त्रेशाय, श्रीभंगललिताकृतये, शुकवागमृताब्धीन्दवे,
गोविंदाय, गोविंदा पतये, वत्सवाट्‍कुचराय,अनंताय धेनुकासुरखडनाय, तृणीकृततृणावर्ताय, यमलार्जुनभंजनाय,
उत्तालतालभेत्रे तमालश्यामकाकृतये, गोपगोपीश्वराय, योगिने, कोटिसूर्यसमप्रभाय, इलापतये, परंज्योतिषे,
यादवेंद्राय, वनमालिने, पीतवाससे, पारिजातापहारकाय, गोवर्धनचलोद्धर्त्रे. गोपालाय, सर्वपालकाय, अजाय,
निरंजनाय, कामजनकाय, कंजलोचनाय, मधुघ्ने, मथुरानाथाय, द्वारकानाथाय, बलिने, वृदावनांत:संचारिणे,
तुलसीदासभूषणाय, मुष्टिकासुरचाणूरमल्लयुद्धविशारदाय, संसारवैरिणे, कंसारये, मुरारये, नरकांतकाय स्यमंतकमणिहर्त्रे,
नरनरायणात्मकाय, कुब्जाकृष्णांबरधराय, माथिने, परमपुरुषाय, अनादिब्रह्मचारिणे, कृष्णाव्यसनकर्षकाय,
शिशुपालशिरश्छेत्रे दुर्योधनकुलांतकाय, विदुराक्रूरवरदाय, विश्वरूपप्रदर्शकाय सत्यवाचे, सत्यसंकल्पाय,
सत्यभामारताय, जयिने, सुभद्रापूर्वजाय, विष्णवे, भीष्ममुक्तिप्रदायकाय, जगद्गुरवे, जगन्नाथाय, वेणुनादविशारदाय,
वृषभासुरविध्वंसिने, बाणासुरबलांतकाय, युधिष्ठिरप्रतिष्ठात्रे, बर्हिबर्हावसंतकाय, पार्थसारथये, अव्यक्ताय,
गीतामृतमहोदधये, कालीयफणिमाणिक्यरंजितश्रीपदांबुजाय, दामोदराय, यज्ञभॊक्त्रे, दानवेंद्रविनाशनाय,
नारायणाय, परब्रह्मणे, पन्नगाशनवाहनाय, जलक्रीडासमासक्तगोपीवस्त्रापहारकाय, पुण्यश्लोकाय, तीर्थप्रदाय,
वेदवेद्याय, दयानिधये, सर्वाभूतात्मकाय, सर्वग्रहरूपिणे, परात्पराय ।

अनेनाष्टोत्तरशतसंख्याकाम-तुलसीपत्रसमर्पणेन भगवान्श्रीसत्यनारायण प्रीयताम्॥
पुढील प्रत्येक नावानंतर ‘नम:’ असा उच्चार करून श्रीसत्यनारायणास १०८ नावांऎवजी १००० तुळशीपत्र वाहावी.
ॐ विश्वस्मै नम:, विष्णवे, वषट्‍काराय, भूतभव्यभवत्प्रभवे, भूतकृते, भूतभृते, भावाय, भूतात्मने, भूतभावनाय, पूतात्मने, परमात्मने, मुक्तानां परमायै, अव्ययाय, पुरुषाय, साक्षिणे, क्षेत्रज्ञाय, अक्षराय, योगाय, योगविदां नेत्रे, प्रधानपुरुषेश्वराय, नारसिंहवपुषे श्रीमते, केशवाय, पुरुषोत्तमाय, सर्वाय, शर्वाय, शिवाय, स्थाणवे, भुतादये, निधये, अव्ययाय संभवाय, भावनाय, भर्त्रे, प्रभवाय, प्रभवे, ईश्वराय, स्वयंभुवे, शंभवे, आदित्याय, पुष्कराक्षाय, महास्वानाय, अनादिनिधनाय, धात्रे, विधाते, तुरुत्तमाय, अप्रमेयाय, ह्रषीकेशाय, पद्मनाभाय, अमरप्रभवे, विश्वकर्मणे, मनवे, त्वष्ट्रे, स्थविष्ठाय, स्थविराय, ध्रुवाय, अग्राह्याय, शाश्वताय, कृष्णाय, लोहिताक्षाय, प्रतर्दनाय, प्रभूताय, त्रिककुब्धाम्ने, पवित्राय, मंगलाय, परस्मै, ईशानाय, प्राणदाय, प्राणाय, ज्येष्ठाय, श्रेष्ठाय, प्रजापतये, हिरण्यगर्भाय, भूगर्भाय, माधवाय, मधुसूदनाय, ईश्वराय, विक्रमिणे, धन्विने, मेधाविने, विक्रमाय, क्रमाय, अनुत्तमाय, दुराधर्षाय, कृतज्ञाय, कृतये, आत्मवते, सुरेशाय, शरणाय, शर्मणे, विश्वरेतसे, प्रजाभवाय, अह्ने, संवत्सराय, व्यालाय, प्रत्याय, सर्वदर्शनाय, अजाय, सर्वेश्वराय, सिद्धाय, सिद्धये, सर्वादये, अच्युताय, वृषाकपये, अमेयात्मने, सर्वयोगविनि:सृताय, वसवे, वसुमनसे, सत्याय, समात्मने, संमिताय, समाय, अमोघाय, पुंडरीकाक्षाय, वृषकर्मणे, वृषाकृतये, रुद्राय, बहुशिरसे बभ्रवे, विश्वयोनये, शुचिश्रवसे, अमृताय, शाश्वतस्थाणवे, वरारोहाय, महापतसे, सर्वगाय, सर्वविद्भानवे, विष्वक्सेनाय, जनार्दनाय, वेदाय, वेदविदे, अव्यंगाय, वेदांगाय, वेदविदे, कवये, लोकाध्यक्षाय, सुराध्यक्षाय, धर्माध्यक्षाय, कृताकृताय, चतुरात्मने, चतुर्व्यूहाय, चतुर्दंष्ट्राय, चतुर्भुजाय, भ्राजविष्णवे, भोजनाय, भोक्त्रे, सहिष्णवे, जगदादिजाय, अनघाय, विजयाय, जेत्रे, विश्वयोनये, पुनर्वसवे, उपेंद्राय, वामनाय, प्रांशवे, अमोघाय, शुचये, ऊर्जिताय, अतींद्राय, संग्रहाय, सर्गाय, धृतात्मने, नियमाय, यमाय, वेद्याय, वैद्याय, सदायोगिने, वीरघ्ने, माधवाय, मधवे, अतींद्रियाय, महामायाय, महोत्साहाय, महाबलाय, महाबुद्धये, महावीर्याय, माहशक्तये, महाद्युतये, अर्निदेश्यवपुषे श्रीमते, अमेयात्मने, महाद्रिधृगे, महेष्वासाय, महीभर्त्रे, श्रीनिवासाय, सतां गतये, अनिरुद्धाय, सुरानंदाय, गोविंदाय, गोविंदापतये, मरीचये, दमनाय, हंसाय, सुपर्णाय, भुजगोत्तमाय, हिरण्यनाभाय, सुतपसे, पद्मनाभाय, प्रजापतये, अमृत्यवे, सर्वदृशे, सिंहाय, संधात्रे, संधिमते, स्थिराय, अजाय, दुर्मर्षणाय, शास्त्रे विश्रुतात्मने, सुरारिघ्ने, गुरवे, गुरुतमाय, धान्मे, सत्याय, सत्यपराक्रमाय, निमिषाय, अनिमिषाय, स्त्रग्विणे, वाचस्पतये, उदारधिये, अग्रगण्ये, ग्रामण्ये, श्रीमते, न्यायाय, नेत्रे, समीरणाय, सहस्त्रमूर्ध्ने, विश्वात्मने, सहस्त्राक्षाय, सहस्त्रपदे, आवर्तनाय, निवृत्तात्मने, संवृताय, संप्रमर्दनाय, अह:संवर्तकाय, वह्नये, अनिलाय, धरणीधराय, सुप्रसादाय, प्रसन्नात्मने, विश्वधृगे, विश्वभुजे, विभवे, सत्कर्त्रे, सत्कृताय, साधवे, जह्नवे, नारायणाय, नराय, असंख्येयाय, अप्रमेयात्मने, विशिष्टाय, शिष्टकृते, शुचये, सिद्धार्थाय, सिद्धसंकल्पाय, सिद्धिदाय, सिद्धिसाधनाय, वृषाहिणे, वृषभाय, विष्णवे, वृषपर्वणे, वृषोदराय, वर्धनाय, वर्धमानाय, विविक्ताय, श्रुतिसागराय, सुभुजाय दुर्धराय, वाग्मिने, महेंद्राय, वसुदाय, वसवे, नैकरूपाय, बृहदरूपाय, शिपिविष्टाय, प्रकाशनाय, ओजस्तेजोद्युतिधराय, प्रकाशात्मने, प्रतापनाय, ऋद्धाय, स्पष्टाक्षराय, मंत्राय, चंद्रांशवे, भास्करद्युतये, अमृतांशूद्भवाय, भानवे, शशबिंदवे, सुरेश्वराय, औषधाय, जगत:सेतवे, सत्यधर्मपराक्रमाय, भूतभव्यभवन्नाथाय, पवनाय, पावनाय, अनलाय, कामघ्ने, कामकृते, कांताय कामाय, कामप्रदाय, प्रभवे, युगादिकृते, युगावर्ताय, नैकमायाय, महाशनाय, अदृश्यायं, व्यक्तरूपाय, सहस्त्रजिते, अनंतजिते, इष्टाय, विशिष्टाय, शिष्टॆष्टाय, शिखंडिने, नहुषाय, वृषाय, क्रोधग्ने, क्रोधकृत्कर्त्रे, विश्वबाहवे, महीधराय, अच्युताय, प्राथिताय, प्राणाय, प्राणदाय, वासवानुजाय, अपांनिधये, अधिष्ठानाय, अप्रमत्ताय प्रतिष्ठिताय, स्कंदाय, स्कंदधराय, धुर्याय, वरदाय, वायुवाहनाय, वासुदेवाय, बृहद्भानवे, आदिदेवाय, पुरंदराय, अशोकाय, तारणाय, ताराय, शूराय, शौरये, जनेश्वराय, अनुकूलाय, शतावर्ताय, पद्मिने, पद्मनिभेक्षणाय, पद्मनाभाय,अरविंदाक्षाय, पद्मगर्भाय, शरीरभृते, महर्द्धये, ऋद्धाय, वृद्धात्मने, महाक्षाय, गरूडध्वजाय, अतुलाय, शरभाय, भीमाय, समयज्ञाय, हविर्हरये, सर्वलक्षणलक्षण्याय, लक्ष्मीवते, समितिंजयाय, विक्षराय, रोहिताय, मार्गहेतवे, दामोदराय, सहाय, महीधराय, महाभागाय, वेगवते, अमिताशनाय, उद्भवाय, क्षोभणाय, देवाय, श्रीगर्भाय, परमेश्वराय, करणाय, कारणाय, कर्त्रे, विकर्त्रे, गहनाय, गुहाय, व्यवसायाय, व्यवस्थानाय, संस्थानाय, स्थानदाय, ध्रुवाय, परर्द्धये, अप्रमायस्पष्टाय, तुष्टाय, पुष्टाय, शुभेक्षणाय, रामाय, विरामाय, विरजाय, मार्गाय नेयाय, नयाय, अनयाय, वीराय, शक्तिमतां- श्रेष्ठाय, धर्माय, धर्मविदुत्तमाय, वैकुंठाय पुरुषाय, प्राणाय, प्राणदाय, प्रणवाय, पृथवे, हिरण्यगर्भाय, शत्रुघ्नाय, व्याप्ताय, वायवे, अधोक्षजाय, ऋतवे, सुदर्शनाय कालाय, परमेष्ठिने, परिग्रहाय, उग्राय, संवत्सराय, दक्षाय विश्रामाय, विश्वदक्षिणाय, विस्ताराय, स्थावरस्थाणवे, प्रमाणाय, बीजायाव्ययाय, अर्थाय, अनर्थाय, महाकोशाय, महाभोगाय, महाधनाय, अनिर्विण्णाय, स्थविष्ठाय, अभुवे, धर्मयूपाय, महामखाय, नक्षत्रनेमये, नक्षत्रिणे, क्षमाय, क्षामाय, समीहनाय, यज्ञाय, ईज्याय, महेज्याय, क्रतवे, सत्राय सतांगतये, सर्वदर्शिने, विमुक्तात्मने, सर्वज्ञाय, ज्ञानमुत्तमाय, सुव्रताय, सुमुखाय, सूक्ष्माय, सुघोषाय, सुखदाय सुह्रदे, मनोहाराय, जितक्रोधाय, वीरबाहवे, विदारणाय, स्थापनाय, स्ववशाय, व्यापिने, नैकात्मने, नैककर्मकृते, वत्सराय, वत्सलाय, वत्सिने, रत्नगर्भाय, धनेश्वराय, धर्मगुपे, धर्मकृते, धर्मिणे, सते, असते, क्षराय, अक्षराय, अविज्ञात्रे, सहस्त्रांशवे, विधात्रे, कृतलक्षणाय, गभस्तिनेमये, सत्त्वस्थाय, सिंहाय, भूतमहेश्वराय, आदिदेवाय, महादेवाय, देवेशाय, देवभृद्गुरवे, उत्तराय, गोपतये, गोप्त्रे, ज्ञानगम्याय, पुरातनाय, शरीरभूतेभृते, भोक्त्रे, कपींद्राय, भूरिदक्षिणाय, सोमपाय, अमृतपाय, सोमाय, पुरुजिते, पुरुसत्तमाय, विनयाय, जयाय, सत्यसंधाय, दाशार्हाय, सात्त्वतांपतये, जीवाय, विनयतासाक्षिणे, मुकुंदाय, अमितविक्रमाय, अंभोनिधये, अनंतात्मने, दहोदधिशयाय, अंतकाय, अजाय महार्हाय, स्वाभाव्याय, जितमित्राय, प्रमोदनाय, आनंदाय नंदनाय, नंदाय, सत्यधर्मणे, त्रिविक्रमाय, महर्षिकपिलाचार्याय, कृतज्ञाय, मेदिनीपतये, त्रिपदाय, त्रिदशाध्यक्षाय, महाशृंगाय, कृतांतकृते, महावराहाय, गोविंदाय, सुषेणाय, कनकांगदिने, गुह्याय, गभीराय, गहनाय, गुप्ताय, चक्रगदाधराय, वेधसे, स्वांगाय, अजिताय, कृष्णाय, दृढाय, संकर्षणाय, अच्युताय, वरुणाय, वारुणाय, वृक्षाय, पुष्कराक्षाय, महामनसे, भगवते, भगघ्ने, आनंदिने, वनमालिने, हलायुधाय, आदित्याय, ज्योतिरादित्याय, सहिष्णवे, गतिसत्तमाय, सुधन्वंने, खंडपरशवे, दारुणाय, द्रविणप्रदाय, दिवस्पृशे, सर्वदृग्वासाय, वाचस्पतये, अयोनिजाय, त्रिसान्मे, सामगाय, सामाय, निर्माणाय, भेषजाय, भिषजे, संन्यासकृते, शमाय, शांताय, निष्ठाशांतिपरायणाय, शुभांगाय, शांतिदाय, स्त्रष्ट्रे, कुमुदाय, कुवलेशयाय, गोहिताय, गोपतये, गोप्त्रे, वृषभाक्षाय, वृषप्रियाय, अनिवर्तिने, निवृत्तात्मने, संक्षेप्त्रे, क्षेमकृते, शिवाय, श्रीवत्सवक्षेसे, श्रीवासाय, श्रीपतये, श्रीमतांवराय, श्रीदाय, श्रीशाय, श्रीनिवासाय, श्रीनिधये, श्रीविभावनाय, श्रीधराय, श्रीकराय, श्रेयसे, श्रीमते, योकत्रयाश्रयाय, स्वक्षाय, स्वंगाय, शतानंदाय, नंदिने, ज्योतिर्गणेश्वराय, वजितात्मने, विधेयात्मने, सत्कीर्तये, छिन्नसंशयाय, उदीर्णाय, सर्वतश्चक्षुषे, अनीशाय, शाश्वतस्थिराय, भूशयाय, भूषणाय, भूतये, विशोकाय, शोकनाशनाय, अर्चिष्मते, अर्चिताय, कुंभाय, विशुद्धात्मने, विशोधनाय, अनिरुद्धाय, अप्रतिरथाय, प्रद्युम्नाय, अमितविक्रमाय, कालनेमिनिघ्ने, वीराय, शौरये, शूरजनेश्वराय, त्रिलोकात्मने, त्रिलोकेशाय, केशवाय, केशिघ्ने, हरये, कामदेवाय, कामपालाय, कामिने, कांताय, कृतागमाय, अनर्देश्यवपुषे विष्णवे, वीराय, अनंताय, धनंजयाय, ब्रह्मण्याय, ब्रह्मकृते, ब्रह्मिणे, ब्रह्मणे, ब्रह्मविवर्धनाय, ब्रह्मविदे, ब्राह्मणाय, ब्रह्मिणे, ब्रह्मज्ञाय, ब्राह्मणाप्रियाय, महाक्रमाय, महाकर्मणे, महातेजसे, महोरगाय, महाक्रतवे, महायज्वने, महायज्ञाय, महाहविषे, स्तव्याय, स्तवप्रियाय, स्तोत्राय, स्तुतये, स्तोत्रे, रणप्रियाय, पूर्णाय, पूरयित्रे, पुण्याय, पुण्यकीर्तये, अनामयाय, मनोजवाय, तीर्थकराय, वसुरेतसे, वसुदाय, वसुप्रदाय, वासुदेवाय, वसवे, वसुमनसे, हविषे, सद्गतये, सत्कृतये, सत्तायै, सद्भूतये, सत्परायणाय, शूरसेनाय, यदुश्रेष्ठायय सन्निवासाय, सुयामुनाय, भूतावासाय, वासुदेवाय, सर्वासुनिलयाय, अनलाय, दर्पघ्ने, दर्पदाय, दृप्ताय, दुर्धराय, अपराजिताय, विश्वमूर्तये, महामूर्तये, दीप्तमूर्तये, अमूर्तिमते, अनेकमूर्तये, अव्यक्ताय, शतमूर्तये, शतानंनाय, एकाय, नैकाय, सवाय, काय, कस्मै, यस्मै, तस्मै, पदमनुत्तमाय, लोकबंधवे, लोकनाथाय, माधवाय, भक्तवत्सलाय, सुवर्णवर्णाय, हेमांगाय, वरांगाय, चंदनांगदिने, वीरघ्ने विषमाय, शून्याय, घृताशिषे, अचलाय, चलाय, अमानिने, मानदाय, मान्याय, लोकस्वामिने, त्रिलोकेधृगे, सुमेधसे, मेधजाय, धन्याय, सत्यमेधसे, धराधराय, तेजोवृषाय द्युतिधराय, सर्वशस्त्रभृतांवराय, प्रग्रहाय, निग्रहाय, व्यग्राय, नैकशृंगाय, गदाग्रजाय, चतुमूर्तये, चतुर्बाहवे, चतुर्व्यूहाय, चतुर्गतये, चतुरात्मने, चतुर्भावाय, चतुर्वेदविदे, एकपदे, समावर्ताय, निवृतात्मने, दुर्जयाय, दुतिक्रमाय, दुर्लभाय, दुर्गमाय, दुर्गाय, दुरावासाय, दुरारिघ्ने, शुभांगाय, लोकसारंगाय, सुतंतवे, तंतुवर्धनाय, इंद्रकर्मणे, महाकर्मणे, कृतकर्मणे, कृतागमाय, उद्भवाय, सुंदराय, सुंदाय, रत्ननाभाय, सुलोचनाय, अर्काय, वाजसनाय, शृंगिणे, जयंताय, सर्वविज्जयिने, सुवर्णबिंदवे, अक्षोभ्याय, सर्ववागीश्वरेश्वराय, महाह्रदाय, महागर्ताय, महाभूताय, महानिधये, कुमुदाय, कुंदराय, कुंदाय, पर्जन्याय, पावनाय, अनिलाय, अमृतांशाय, अमृतवापुषे सर्वज्ञाय सर्वतोमुखाय, सुलभाय, सुव्रताय, सिद्धाय, शत्रुजिते, शत्रुतापनाय, न्यग्रोधाय, उदुंबराय, अश्वत्थाय, चाणूरांध्रनिषूदनाय, सहस्त्रर्चिषे, सप्तजिव्हाय, सप्तैधसे, सप्तवाहनाय, अमूर्तये, अनघाय, अचिंत्याय, भयकृते, भयनाशाय, अणवे, बृहते, कृशाय, स्थूलाय, गुणभृते, निर्गुणाय, महते, अधृताय, स्वधृताय, स्वास्याय, प्राग्वंशाय, वंशवर्धनाय, भारभृते, कथिताय, योगिने, योगीशाय, सर्वकामदाय, आश्रमाय, श्रमणाय, क्षामाय, सुपर्णाय, वायुवाहनाय, धनुर्धराय, धनुर्वेदाय, दंडाय, दमयित्रे, दमाय, अपराजिताय, सर्वसहाय, नियंत्रे, नियमाय, यमाय, सत्तवते, सात्तिकाय, सत्याय, सत्यधर्मपरायणाय, अभिप्रायाय, प्रियार्हाय, अर्हाय, प्रियकृते, प्रीतिवर्धनाय, विहायसगतये, ज्योतिषे, सुरुचये, हुतभुजे, विभवे, रवये, विरोचनाय, सूर्याय, सवित्रे, रविलोचनाय, अनंताय, हुतभुजे, भोक्त्रे, सुखदाय, नैकजाय, अग्रजाय, अर्निर्विण्णाय, सदमर्षिणे, लोकाधिष्ठानाय, अद्भुताय, सनाते, सनातनमाय, कपिलाय, कपये, अव्ययाय, स्वस्तिदाय, स्वस्तिकृते, स्वस्तने, स्वस्तिभुजे, स्वस्तिदक्षिणाय, अरौद्राय, कुंडलिने, चक्रिणे, विक्रमिणे, उर्जितशासनाय, शब्दातिगाय, शब्दसहाय, शिशिराय, शर्वरीकराय, अक्रूराय, पेशलाय, दक्षाय, दक्षिणाय, क्षमिणांवराय, विद्वत्तमाय, वीतभयाय, पुण्यश्रवणकीर्तनाय, उत्तारणाय, दुष्कृतिघ्ने, पुण्याय, दु:स्वप्नाशनाय, वीरघ्ने, रक्षणाय, संताय, जीवनाय, पर्यवस्थिताय, अनंतरुपाय, अनंतश्रिये, जितमन्यवे, भयापहाय, चतुरस्ताय गभीरात्मने, विदिशाय, व्यादिशाय, दिशाय, अनादये, भुवे, भुवोलक्ष्म्यै, सुवीराय, रुचिरांगदाय, जननाय, जनजन्मादये, भीमाय, भीमपराक्रमाय, आधारनिलयाय, धात्रे, पुष्पहासाय, प्रजागराय, उर्ध्वगाय, सत्पथाचाराय, प्राणदाय, प्रणवाय, पणाय, प्रमाणाय, प्राणनिलयाय, प्राणभृते, प्राणजीवनाय, तत्त्वाय, सत्त्वविदे, एकात्मने, जन्ममृत्युजरातिगाय, भूर्भुव:स्वस्तरवे, ताराय, सपित्रे, प्रपितामहाय, यज्ञाय, यज्ञपतये, यज्वने, यज्ञांगाय, यज्ञवाहनाय, यज्ञभृते, यज्ञिने, यज्ञभुजे, यज्ञसाधनाय, यज्ञांतकृते, यज्ञगुह्याय, अन्नाय, अन्नादाय, आत्मयोनये, स्वयंजाताय, वैखानाय, सामगायनाय, देवकीनंदनाय, स्त्रष्ट्रे, क्षितीशाय, पापनाशनाय, शंखभृते, नंदकिने, चक्रिणे, शार्ङ्गधन्वने, गदाधराय, रथांगपाणये, अक्षोभ्याय, सर्वप्रहरणायुधाय नम: ।

याप्रमाणे श्रीसत्यनारायणास १००० तुळशीपत्रे वाहावी.
ॐ यत्पंरुषं व्यदधु: कतिधा व्यकल्पयन्‌ । मुखं किमस्य को बाहू का ऊरू पादो उच्यते ।
वनस्पतिरसोद्भूतो गंधाढ्यो गंध उत्तम: । अघ्रेय: सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । धूपं समर्पयामि ।

(देवाला उदबत्तीने ओवाळावे.)
ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्य: कृत: । ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्‌भ्यां शूद्रो अजायत ॥
आज्यं सुवर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया । दीपं गृहाण देवेश त्र्यैलोक्यतिमिरापह ॥
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने । त्राहि मां निरयात्घोरात्दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: ।

(देवाला तुपातील फुलवात नीरांजनात ठेवलेली असेल त्या नीरांजनाने ओवाळावे.)
ॐ चंद्रमा मनसो जातश्चक्षो: सूर्यो अजायत । मुखादिंद्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु । ईप्सितं मे वरं देहि परत्रं च परां गतिम्।
शर्कराखंडखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च । आहातं भक्ष्यभॊज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । संयावकनैवेद्यं समर्पयामि ।
ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ।
ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा।

(या मंत्रांनी नैवेद्य दाखवावा.) मध्ये
पानीयं समर्पयामि ।
(पळीभर पाणी सोडून पुन्हा वरीलप्रमाणे मंत्र म्हणून पुन्हा नैवेद्य समर्पण करावा.)
उत्तरापोशनं समर्पयामि । हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि । मुखप्रक्षालन समर्पयामि ।
करोद्वर्तनार्थे चंदनं समर्पयामि ।

(संध्येच्या पळीने पाणी सोडावे. देवाला गंध लावावे. गंध नेहमी करांगुलीच्या अलीकडील बोटाने म्हणजे अनामिकेने लावावे.)

पूगीफूलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरैलासमायुक्तं तांबूलं प्रतिगृह्यतम्।
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । तांबूलं समर्पयामि ।

(दोन विड्यांच्या पानांवर सुपारी-पैसा ठेवून त्यावर उदक घालावे.)
फलेन फलितं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्। तस्मात्फलप्रदानेन सफला स्युर्मनोरथा: ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । विविधफलानि नारीकेलफलं च समर्पयामि । नमस्करोमि ।

(असे म्हणून देवापुढे श्रीफल नारळ कुंकु लावून ठेवावा. एक केळे, एक पेरू, एक नारिंग इत्यादि जी फळे आणली असतील ती ठेवावी व त्यानंतर पाणी सोडावे.)
हिरण्यगर्भगर्भस्य हेमबीजं विभोवसो: । अनंतपुण्यालदमत: शांतिं प्रयच्छ मे ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: महादक्षिणां समर्पयामि।
चंद्रादित्यौ च धरणिर्विद्युदग्निस्तथैव च । त्वमेव सर्वज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृहय्ताम्॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । महानीरांजनदीपं समर्पयामि ।

( देवाला निरांजन ओवाळावे.)
कर्पूरगौरं करूणावतारं संसारसारं भुजगेंद्रहारम्।
सदावसंतं ह्रदयारविंदे भवं भवानीसहितं नमामि ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । कर्पूरार्तिक्यदीपं समर्पयामि ।

(देवाला कापूर लावून ओवाळावे.)
नमस्करोमि ।
ॐ नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णोद्यौ: समर्वतत । पद्‌भ्यां भूमिर्दिश: श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥
यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च । तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । प्रदक्षिणां समर्पयामि ।
(आपल्याभोवती उजवीकडून डावीकडे वाटोळे फिरावे.)
ॐ सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि: सप्तसमिध: कृता । देवायद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुं ।
नम: सर्वाहितार्थाय जगदाधारहेतवे साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृत: ।
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । नमस्कारं समर्पयामि ।

(देवापुढे किंचित उजव्या बाजूला सरून नमस्कार घालावा.)
ॐ यज्ञेन्यज्ञमयजंत्‌ देवास्तानि धर्माणी प्रथम्यासन्। ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वेसाध्या: संतिदेवा: ।
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । मंत्रपुष्पं समर्पयामि ।

(देवाला मंत्रपुष्प म्हणजे फुले व अक्षता वाहाव्या.)
*
अथ प्रार्थना
आवाहनं न जानमि न जानमि तवार्चनम्।
पूजां चैव न जानमि क्षमस्व परमेश्वर ॥ १ ॥
मंत्रहीनं क्रीयाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ २ ॥
सत्यनारायणं देवं वन्देऽहं कामदं प्रभुम्।
लीलया विततं विश्वं येत तस्मै नमोनम: ॥ ३ ॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्बिषो जहि ।
पुत्रान्देहि धनं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे ॥ ४ ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तप: पूजाक्रियादिषु
न्यूनं संपूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥ ५ ॥
श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवाराय नम: । प्रार्थना समर्पयामि ।
अनेनकृत षोडशोपचारपूजनेन तेन श्रीसत्यनारायण: श्रीसत्यनारायणाय साङगाय सपरिवार प्रीयताम्। ॐ तत्सत्
(वरील मंत्र म्हणून उजव्या हातावरून समोर ताम्हनात पाणी सोडावे.)
*
अथ सरस्वतीपूजा ।
अथ व्रतांगभूतं पुस्तकथा श्रीसरस्वतीपूजनम्। ॐ केशवाय नम: ।
ॐ नारायणाय नम: । ॐ माधवाय नम: । ॐ गोविंदाय नम: ।
अद्य पूर्वोच्चरितवर्तमान-एवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ मम
आत्मन: श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं सत्यनारायणव्रतांगभूतं सरस्वतीपूजनं व्यासपूजनं च करिष्ये ।
(वरील मंत्र म्हणून ताम्हनात उदक सोडावे, व नंतर)
पुस्तकस्था श्रीसरस्वतीदेव्यै नम: । सर्वोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।

(हा मंत्र म्हणून सत्यनारायणाच्या पोथीवर गंध, अक्षता, फूले व तुळशी वाहाव्या.)
श्रीसरस्वतीदेव्यै नम: । हरिद्रां कुंकुमं सौभाग्यद्र्व्यं च समर्पयामि ।

(असे म्हणून पोथीवर हळदकुंकू, बुक्का वगैरे वाहावीत.)
श्री सरस्वतीदेव्यै नम: । धूपं दीपं नैवेद्यं च समर्पयामि ।

(असे म्हणून उदबत्ती व निरांजन ओवाळून नैवेद्य दाखवावा.)
श्रीसरस्वतीदेव्यै नम: । महादक्षिणां समर्पयामि

(असे म्हणून पोथीपुढे महादक्षिणा व विडासुपारी ठेवावी.)
श्रीसरस्वतीदेव्यै नम: । मंत्राक्षतांन पुष्पं च समर्पयामि

(असे म्हणून पोथीला फुले व अक्षता वाहाव्या.)
अनेन कृतसरस्वतीपूजनेन तेन श्रीसरस्वती प्रीयताम्।

(असे म्हणून ताम्हनात उदक सोडावे.)
*अथ ब्राह्मणपूजा ।
महाविष्णुस्वरूपिणे ब्राह्मणाय इदमासनम्

(असे म्हणून ब्राह्मणाच्या पाटावर उजव्या बाजूस अक्षता वाहाव्या.)
इदं पाद्यम सुपाद्यम्

(ब्राह्मणाच्य़ा हातावर पळीभर पाणी घालावे.)
इदमर्घ्यम्

(हातावर गंधाक्षतायुक्त पाणी घालावे.)
अस्त्वर्ध्यम्।

इदमाचमनीयम् (पळीभर पाणी हातावर घालावे.)
अस्त्वाचमनीयम्।
गंधा: पांतु सौमंगल्यं चास्तु अक्षता: पांतु आयुष्यमस्तु पुष्पं पातु सौश्रेयसमस्तु तांबुलं पात ऎश्वर्यमस्तु, दक्षिणा: पांतु बहुदेयं चास्तु ।

(वरील मंत्र म्हणुन गंध, अक्षता, फुले, तुळशीपत्र, विडा, सुपारी, दक्षिणा पूजा सांगणार्‍या ब्राह्मणाच्या हातावर द्यावी व मस्तकावर अक्षता वाहून नमस्कार करावा व पुढील मंत्र म्हणावा.)
दिर्घमायु: श्रेय: शंति: पुष्टि;तुष्टिश्चास्तु ॥ नमोस्त्वनंताय सहस्त्रमूर्तये सहस्त्रापादाक्षिशिरोरूबाहवे ॥
सहस्त्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्त्रकोटीयुगधारिए नम: ॥ १ ॥
सकलाराधनै: स्वर्चितमस्तु । अस्तु सकलाधनै: स्वर्चितम्।

(सत्यनारायणाचे तीर्थ घेण्याचा मंत्र )
अकालमृत्युहरण सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णुपादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यहम्॥
पादोदकं सत्यदेव नरो य: पिबते तव । तस्यान्तर्गतजं पापं नश्यते संशय: ॥

(प्रसाद घेण्याचा मंत्र)
नारायणप्रसादं तु गृहीत्वा भक्तिभावत: । सर्वान्कामान्अवाप्नोति प्रेत्यसायुज्यमाप्नुयात्॥अथ दंपतीभोजनसंकल्प: ।
श्रीसत्यनारायणव्रतांगभूतं श्रीसत्यनारायणप्रीत्यर्थं दंपतीभोजनं यथाशक्ति दक्षिणाप्रदानं च करिष्ये ।
(दांपत्य न मिळेल तर “ब्राह्मणसुवासिनीभोजनं” किंवा केवळ “ब्राह्मणभोजनं करिष्ये” असा संकल्प करावा.)
अथ पंचोपचारपूजा ।
(उत्तरपूजा)

उत्तरपूजा करून अन्नाचा महानैवेद्य दाखवावा व नंतर आरती, मंत्रपुष्प करावा.
(किंवा उत्तरपूजा गौणत्वाने दुसर्‍या दिवशी सकाळी करावी.)
आचम्य । श्रीसत्यनारायणप्रीत्यर्थं गंधादिपंचोपचारै: पूजनं करिष्ये ।
श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: । विलेपनार्थे चंदनं समर्पयामि ।
अक्षतां हरिद्रां कुंकुमं च समर्पयामि ।श्रीसत्यनारायणाय साङ्गाय सपरिवाराय नम: ।
पूजार्थे पुष्पाणि तुलसीपत्राणि समर्पयामि

(वरील मंत्र म्हणून सत्यनारायणला गंध, फुले, तुळशी, अक्षता, हळदकुंकू वगैरे वाहावीत.)
श्रीसत्यनारायणाय नम: । धूपं समर्पयामि । श्रीसत्यनारायणाय नम: ।
दीपं समर्पयामि । श्रीसत्यनारायणाय नम:। महानैवेद्यं समर्पयामि ।

(वरील मंत्र म्हणून धूपदीप ओवाळावा व नंत्र महानैवेद्य दाखवावा.) इतके झाल्यावर आरती करावी, नंतर प्रार्थना करावी व मंत्रपुष्पांजली म्हणावी.
श्रीसत्यनारायणाय नमस्करोमि ।
अनेनकृतंपंचोपचारपूजनेन तेन श्रीसत्यनारायण: साङ्ग: सपरिवार: प्रीयताम्।

श्रीसत्यनारायणदेवाव्यतिरक्त देवाचे विसर्जन खालील मंत्राने करावे. (Satyanarayan Uttar Puja Mantra)
यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय पार्थिवीम्।
इष्टकामंप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ॥