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भैरव चालीसा

काल भैरव और बटुक भैरव को समर्पित भक्ति-स्तुति

रचयिता: पारंपरिक · 30 चौपाई · लगभग 6 मिनट

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By the BhaktiRas Editorial Team · Updated

Bhairav Chalisa

भैरव चालीसा भगवान भैरव को समर्पित एक चालीस पद की भक्ति-स्तुति है। भैरव, शिव के भयंकर किंतु रक्षक रूप हैं, जिन्हें काल भैरव और बटुक भैरव के रूप में पूजा जाता है, और काशी के रक्षक (कोतवाल) के रूप में सम्मानित किए जाते हैं। जहाँ काल भैरव को भयानक और गंभीर माना जाता है, वहीं बटुक भैरव को एक सौम्य, सुलभ रक्षक के रूप में पूजा जाता है, जिन्हें अक्सर माता काली का प्रिय पुत्र कहा जाता है।

भैरव चालीसा पाठ (देवनागरी)

संपूर्ण पाठ — हर चौपाई के नीचे “अर्थ” पर टैप करके सरल हिंदी अर्थ देखें।

Doha

श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ।
चालीसा वंदन करो श्री शिव भैरवनाथ॥

अर्थ

प्रेम से मैं गणपति, गुरु और माता गौरी के चरण अपने मस्तक पर धारण करता हूँ। श्रद्धा से भैरवनाथ, शिव के इस रूप में इस चालीसा की वंदना करता हूँ।

Doha

श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल।
श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥

अर्थ

श्री भैरव संकटों को दूर करते हैं और अपनी करुणा से मंगल करते हैं। उनका शरीर गहरे रंग का और भयंकर है, और उनकी विशाल लाल आँखें शक्ति से भरी हैं।

1

जय जय श्री काली के लाला।
जयति जयति काशी-कुतवाला॥

अर्थ

जय हो, जय हो काली माता के प्रिय पुत्र को। काशी के रक्षक कोतवाल को बार-बार नमन है।

2

जयति बटुक-भैरव भय हारी।
जयति काल-भैरव बलकारी॥

अर्थ

बटुक भैरव, भय को हरने वाले को जय। काल भैरव, शक्ति और बल देने वाले को जय।

3

जयति नाथ-भैरव विख्याता।
जयति सर्व-भैरव सुखदाता॥

अर्थ

प्रसिद्ध नाथ-भैरव को जय। सभी रूपों में भैरव को जय, जो सुख देने वाले हैं।

4

भैरव रूप कियो शिव धारण।
भव के भार उतारण कारण॥

अर्थ

शिव ने भैरव का रूप धारण किया, संसार की पीड़ा से मुक्ति के लिए। भवसागर के भार को हल्का करने के उद्देश्य से उन्होंने यह रूप लिया।

5

भैरव रव सुनि हवै भय दूरी।
सब विधि होय कामना पूरी॥

अर्थ

भैरव की गर्जना सुनकर भय दूर हो जाता है। हर तरह की कामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

6

शेष महेश आदि गुण गायो।
काशी-कोतवाल कहलायो॥

अर्थ

शेषनाग, महेश और देवताओं ने उनके गुणों का गान किया है। वे काशी के कोतवाल के नाम से प्रसिद्ध हैं।

7

जटा जूट शिर चंद्र विराजत।
बाला मुकुट बिजायठ साजत॥

अर्थ

उनके जटाजूट पर चंद्र विराजमान है। सिर पर का मुकुट उन्हें विशिष्ट सुंदरता प्रदान करता है।

8

कटि करधनी घुंघरू बाजत।
दर्शन करत सकल भय भाजत॥

अर्थ

कमर में घुंघरुओं वाली करधनी बजती है। उनके दर्शन से ही समस्त भय भाग जाता है।

9

जीवन दान दास को दीन्ह्यो।
कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो॥

अर्थ

उन्होंने अपने सेवकों को जीवन का वरदान दिया है। नाथ की कृपा ही उनका सच्चा रूप दिखाती है।

10

वसि रसना बनि सारद-काली।
दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली॥

अर्थ

शारदा और काली के रूप में वे जिह्वा पर वास करते हैं। उन्होंने वरदान दिया है और अपने भक्त की लाज रखी है।

11

धन्य धन्य भैरव भय भंजन।
जय मनरंजन खल दल भंजन॥

अर्थ

धन्य हैं, धन्य हैं भैरव, भय का विनाश करने वाले। जय हो मन को आनंदित करने वाले, दुष्टों की सेना को तितर-बितर करने वाले।

12

कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा।
कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा॥

अर्थ

हाथों में त्रिशूल, डमरू और शुद्ध चाबुक धारण करते हैं। उनकी कृपा की झलक और यश वास्तव में असीम हैं।

13

जो भैरव निर्भय गुण गावत।
अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत॥

अर्थ

जो भैरव के गुणों का निर्भय होकर गान करते हैं, वे आठों सिद्धियों और नौ निधियों का फल पाते हैं।

14

रूप विशाल कठिन दुख मोचन।
क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन॥

अर्थ

विशाल रूप, गहरी पीड़ा से मुक्ति देने वाले। भयंकर क्रोध में उनकी दोनों आँखें लाल हो उठती हैं।

15

अगणित भूत प्रेत संग डोलत।
बम बम बम शिव बम बम बोलत॥

अर्थ

असंख्य भूत-प्रेत उनके साथ चलते हैं। 'बम, बम, बम शिव, बम बम' का शब्द गूँजता रहता है।

16

रुद्रकाय काली के लाला।
महा कालहू के हो काला॥

अर्थ

रुद्र का शरीर धारण किए, काली माता के प्रिय पुत्र। आप महाकाल से भी बड़े काल हैं।

17

बटुक नाथ हो काल गंभीरा।
श्वेत रक्त अरु श्याम शरीरा॥

अर्थ

बटुक नाथ, आप काल की तरह गंभीर हैं। श्वेत, रक्त और श्याम रंगों में आपका शरीर प्रकट होता है।

18

करत नीनहूं रूप प्रकाशा।
भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा॥

अर्थ

इन तीनों रूपों में आप प्रकाश फैलाते हैं। अपने सच्चे भक्तों को आप शुभ आशा से भर देते हैं।

19

रत्न जड़ित कंचन सिंहासन।
व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन॥

अर्थ

रत्नों से जड़ा सोने का सिंहासन। व्याघ्र-चर्म पर बैठे हैं, कोमल और निर्मल मुख।

20

तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं।
विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं॥

अर्थ

जो भक्त काशी जाकर आपका ध्यान करते हैं, विश्वनाथ के दर्शन भी पा लेते हैं।

21

जय प्रभु संहारक सुनन्द जय।
जय उन्नत हर उमा नन्द जय॥

अर्थ

जय हो, प्रभु, संहार करने वाले और आनंद देने वाले को जय। जय हो उन्नत, हरि और उमा के आनंद को।

22

भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय।
वैजनाथ श्री जगतनाथ जय॥

अर्थ

भयंकर तीन आँखों वाले को जय, जिनके साथ कुत्ता चलता है। वैजनाथ और जगतनाथ को जय।

23

महा भीम भीषण शरीर जय।
रुद्र रुद्राक्ष धारी वीर जय॥

अर्थ

महान भीम, भयंकर शरीर वाले को जय। रुद्राक्ष धारी वीर रुद्र को जय।

24

त्रिशूल डमरू धारी दमकवत।
सदा शिव की सेवा पावत॥

अर्थ

त्रिशूल और डमरू धारण किए दमकते हैं। शिव की सेवा सदा पाते हैं।

25

ब्रह्मा का मान मर्दन करिहो।
भव के भार उतारण करिहो॥

अर्थ

ब्रह्मा का अहंकार मिटाते हो। भवसागर का भार उतार देते हो।

26

करि कृपा प्रभु दास पे कीजै।
अब मोहि भव सागर तें दीजै॥

अर्थ

प्रभु, अपनी कृपा दास पर कीजिए। अब मुझे भवसागर से पार करा दीजिए।

27

मैं अनाथ नाथ तुम मेरे।
जय जय जय भैरव बड़े घनेरे॥

अर्थ

मैं अनाथ हूँ, नाथ आप ही मेरे हो। जय हो, जय हो, जय हो भैरव, आप बहुत बड़े हैं।

28

भैरव भक्ति हमें दीजै।
ह्रदय वास शिव का कीजै॥

अर्थ

भैरव की भक्ति हमें प्रदान करो। हमारे हृदय में शिव को वास करा दो।

29

ऋद्धि सिद्धि सब सुख दीजै।
अंत समय शिव पुर कीजै॥

अर्थ

ऋद्धि-सिद्धि और सभी सुख दे दो। अंत के समय शिवपुर में स्थान दिला दो।

30

करत न्याय दीन की रखवारी।
भैरव रव सुन भाजे भारी॥

अर्थ

न्याय करते हो और दीनों की रक्षा करते हो। भैरव की गर्जना सुनकर भारी संकट भी भाग जाते हैं।

Doha

जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार।
कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार॥

अर्थ

जय हो, जय हो, जय हो भैरव बटुक स्वामी, जो सभी संकटों को दूर करते हैं। शंकर के अवतार, इस दास पर अपनी कृपा प्रकट कीजिए।

भैरव चालीसा पाठ के लाभ

भैरव चालीसा के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  • भय से मुक्ति: भैरव को ‘भय-हारी’ और ‘संकट-हारी’ के रूप में पुकारा जाता है – चिंता, संकट या अचानक आने वाले खतरे के समय मन को स्थिर करता है।
  • सुरक्षा और रक्षा: काशी के कोतवाल (रक्षक) के रूप में पूजे जाते हैं – घर, यात्रा और परिवार को हानि से बचाव के लिए आह्वान किया जाता है।
  • साहस और आत्मविश्वास: भयंकर मूर्तिरूप कठिन लोगों या परिस्थितियों का सामना करने का साहस जगाता है।
  • बाधा-निवारण: श्लोक हर प्रयास को सफल बनाने के लिए भैरव को पुकारते हैं – महत्वपूर्ण कार्यों से पहले पाठ किया जाता है।
  • अशांत शक्तियों से शांति: भैरव भूतों और आत्माओं के स्वामी हैं – अदृश्य प्रभावों के भय से राहत के लिए पाठ किया जाता है।
  • आंतरिक स्थिरता: प्रत्येक श्लोक के अर्थ पर चिंतन करने से भक्ति, एकाग्रता और शांत विश्वास पनपता है।

भैरव चालीसा का पाठ कब और कैसे करें

रविवार और मंगलवार को भैरव की पूजा विशेष रूप से अनुकूल मानी जाती है, जो परंपरा से भैरव-पूजन से जुड़े हैं। स्नान के बाद, भैरव की मूर्ति के सामने शांत भाव से बैठें, दीप जलाएँ और अगरबत्ती लगाएँ। धीरे-धीरे और ज़ोर से दोनों उद्घाटन दोहों से शुरू करके चौपाइयों का पाठ करें। ईमानदार ध्यान और भक्ति-भाव अनुष्ठान की बाहरी परिपूर्णता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

भैरव चालीसा किसने लिखी?

भैरव चालीसा चालीसा के शास्त्रीय रूप का अनुसरण करता है – दो उद्घाटन दोहे, उसके बाद तीस चौपाई और एक समापन दोहा, सरल हिंदी में रचित। यह भगवान भैरव को संबोधित है, जिन्हें काल भैरव और बटुक भैरव के रूप में पूजा जाता है और काशी के रक्षक (कोतवाल) के रूप में सम्मानित किया जाता है। श्लोक क्रमशः उनके अनेक नाम और उपाधियों, उनके भयंकर किंतु रक्षक स्वरूप, त्रिशूल-डमरू-घंटियों के धारक के रूप में उनकी छवि, तथा भय दूर करने और सुरक्षा प्रदान करने की उनकी शक्ति का वर्णन करते हैं। यह शैव और तांत्रिक परंपरा पर आधारित रचना है, जिसका पाठ काशी, उज्जैन तथा उत्तर भारत के अधिकांश भागों में किया जाता है। यह परंपरागत और भक्ति-केंद्रित रचना है, किसी एक नामित लेखक की कृति नहीं।

सामान्य प्रश्न (FAQ)

भैरव चालीसा क्या है?

भैरव को समर्पित एक चालीस पद की हिंदी भक्ति-स्तुति है। यह बटुक भैरव, जो भैरव का बाल या युवा रूप है, की प्रशंसा करता है – शिव की एक रक्षक अभिव्यक्ति, जिसे काली माता के पुत्र के रूप में सम्मानित किया जाता है। दो उद्घाटन दोहे, तीस चौपाई और एक समापन दोहा उनके नाम, रूप और सुरक्षात्मक कृपा का वर्णन करते हैं।

बटुक भैरव कौन हैं, और वे काल भैरव से कैसे भिन्न हैं?

बटुक भैरव भैरव का युवा या बाल रूप हैं। काल भैरव को भयानक, गंभीर और भयोत्पादक के रूप में पूजा जाता है; बटुक एक सौम्य, अधिक सुलभ रक्षक हैं, यद्यपि दोनों एक ही भैरव के विभिन्न पहलू हैं।

इसके पाठ के क्या लाभ हैं?

सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों से बचाव, भय और चिंता से मुक्ति, कठिन परिस्थितियों में साहस, महत्वपूर्ण कार्यों से पहले बाधा-निवारण, अशांत प्रभावों से शांति। भैरव को एक रक्षक के रूप में वर्णित किया जाता है जो विश्वासियों को सुरक्षित रखते हैं और ईमानदार इच्छाओं को पूरा करते हैं।

कौन सा दिन सबसे शुभ है?

रविवार और मंगलवार को सबसे अनुकूल माना जाता है, जो परंपरागत रूप से भैरव-पूजन से जुड़े हैं। विशेषतः कार्तिक मास की अष्टमी (काल भैरव अष्टमी) को सर्वाधिक शुभ माना जाता है।

इसमें कितने श्लोक हैं?

दो उद्घाटन दोहे, तीस चौपाई चौपैरें और एक समापन दोहा, जो चालीसा के मानक रूप से पूरी तरह मेल खाते हैं।

क्या इसे अंग्रेजी में भी पढ़ा जा सकता है?

हाँ, पूरा रोमन लिप्यंतरण उपलब्ध है, प्रत्येक श्लोक के लिए स्पष्ट अर्थ सहित।

॥ जय जय भैरव बटुक स्वामी ॥  •  ॥ ॐ नमः शिवाय ॥