ॐ
अन्नपूर्णा चालीसा
श्री अन्नपूर्णा माता चालीसा — अर्थ सहित

अन्नपूर्णा चालीसा काशी (वाराणसी) में पूजित अन्नपूर्णा देवी को समर्पित चालीस चौपाइयों की भक्ति-स्तुति है। वे माता पार्वती का ही करुणामय रूप हैं और हर घर की रसोई तथा अन्न-भंडार को भरा रखने वाली देवी मानी जाती हैं। इस पृष्ठ पर देवनागरी में संपूर्ण चालीसा, हर चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दी गई है।
अन्नपूर्णा चालीसा पाठ (देवनागरी)
संपूर्ण पाठ — हर चौपाई के नीचे “अर्थ” पर टैप करके सरल हिंदी अर्थ देखें।
विश्वेश्वर-पदपदम की, रज-निज शीश-लगाय।
अन्नपूर्णे! तव सुयश, बरनौं कवि-मतिलाय॥
अर्थ
विश्वेश्वर (शिव) के चरण-कमलों की धूलि अपने मस्तक पर धारण कर, मैं अल्पबुद्धि कवि माँ अन्नपूर्णा के सुयश का वर्णन करने का प्रयास करता हूँ।
नित्य आनन्द करिणी माता।
वर-अरु अभय भाव प्रख्याता॥
अर्थ
हे माता, आप सदा आनंद प्रदान करने वाली हैं; आप वरदान और अभय भाव देने वाली देवी के रूप में विख्यात हैं।
जय! सौंदर्य सिन्धु जग-जननी।
अखिल पाप हर भव-भय हरनी॥
अर्थ
हे सौंदर्य की सागर, जगत की जननी, आपकी जय हो। आप समस्त पापों का नाश करने वाली और संसार के भय को हरने वाली हैं।
श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि।
सन्तन तुव पद सेवत ऋषिमुनि॥
अर्थ
श्वेत मुख और श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, ऋषि-मुनि सदा आपके चरणों की सेवा करते हैं।
काशी पुराधीश्वरी माता।
माहेश्वरी सकल जग-त्राता॥
अर्थ
हे माता, आप काशी नगरी की अधीश्वरी हैं, माहेश्वरी हैं, संपूर्ण जगत की रक्षक हैं।
बृषभारुढ़ नाम रुद्राणी।
विश्व विहारिणि जय! कल्याणी॥
अर्थ
वृषभ पर सवार होने के कारण आप रुद्राणी कहलाती हैं; आप संपूर्ण विश्व में विचरण करती हैं। हे कल्याणी, आपकी जय हो।
पदिदेवता सुतीत शिरोमनि।
पदवी प्राप्त कीह्न गिरि-नंदिनि॥
अर्थ
आप पतिव्रता स्त्रियों में शिरोमणि हैं; गिरिराज की पुत्री होकर आपने यह सर्वोच्च पद प्राप्त किया।
पति विछोह दुख सहि नहि पावा।
योग अग्नि तब बदन जरावा॥
अर्थ
पति के वियोग का दुख सहन न कर सकीं, और योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर दिया।
देह तजत शिव-चरण सनेहू।
राखेहु जाते हिमगिरि-गेहू॥
अर्थ
शिव-चरणों के प्रेम में देह त्यागते हुए, आप पुनः हिमगिरि के घर में जन्म लेकर रक्षित हुईं।
प्रकटी गिरिजा नाम धरायो।
अति आनन्द भवन मँह छायो॥
अर्थ
आप गिरिजा नाम से पुनः प्रकट हुईं, और उस भवन में अपार आनंद छा गया।
नारद ने तब तोहिं भरमायहु।
ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु॥
अर्थ
तब नारद जी ने आपको समझाया और विवाह के लिए साधना का मार्ग सिखाया।
ब्रह्मा-वरुण-कुबेर गनाये।
देवराज आदिक कहि गाय॥
अर्थ
ब्रह्मा, वरुण, कुबेर सहित देवराज इंद्र आदि सभी देवताओं ने आपका गुणगान किया।
सब देवन को सुजस बखानी।
मतिपलटन की मन मँह ठानी॥
अर्थ
सब देवताओं की महिमा का वर्णन करने के बाद, नारद जी ने आपके संकल्प की दृढ़ता परखने का विचार किया।
अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या।
कीह्नी सिद्ध हिमाचल कन्या॥
अर्थ
हे हिमाचल-कन्या, आप अपने संकल्प पर अटल रहीं, धन्य हैं आप, और इस प्रकार आपने अपनी सिद्धि प्रमाणित की।
निज कौ तव नारद घबराये।
तब प्रण-पूरण मंत्र पढ़ाये॥
अर्थ
अपनी ही योजना से नारद जी स्वयं घबरा गए, तब उन्होंने आपको संकल्प-पूर्ति का मंत्र सिखाया।
करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ।
सन्त-बचन तुम सत्य परेखेहु॥
अर्थ
तपस्या के लिए उन्होंने आपको उपदेश दिया, और आपने संतों के वचनों को सत्य सिद्ध किया।
गगनगिरा सुनि टरी न टारे।
ब्रह्मा, तब तुव पास पधारे॥
अर्थ
आकाशवाणी सुनकर जो टाली न जा सकी, स्वयं ब्रह्मा जी आपके समीप पधारे।
कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा।
देहुँ आज तुव मति अनुरुपा॥
अर्थ
उन्होंने कहा, हे पुत्री, अनुपम वर माँगो; आज मैं तुम्हारी इच्छानुसार वरदान दूँगा।
तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी।
कष्ट उठायेहु अति सुकुमारी॥
अर्थ
आपने अलौकिक और अत्यंत कठोर तपस्या की, इतनी सुकुमार होते हुए भी महान कष्ट सहन किए।
अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों।
है सौगंध नहीं छल तोसों॥
अर्थ
अब मुझसे कोई संदेह मत रखो, मैं शपथपूर्वक कहता हूँ, इसमें कोई छल नहीं है।
करत वेद विद ब्रह्मा जानहु।
वचन मोर यह सांचो मानहु॥
अर्थ
वेदों को जानने वाले ब्रह्मा के इस कथन को सत्य मानो, यह मेरे वचन हैं।
तजि संकोच कहहु निज इच्छा।
देहौं मैं मन मानी भिक्षा॥
अर्थ
संकोच त्याग कर अपनी इच्छा कहो, मैं तुम्हारे मन के अनुरूप वरदान दूँगा।
सुनि ब्रह्मा की मधुरी बानी।
मुखसों कछु मुसुकायि भवानी॥
अर्थ
ब्रह्मा जी की मधुर वाणी सुनकर, देवी भवानी के मुख पर मंद मुस्कान छा गई।
बोली तुम का कहहु विधाता।
तुम तो जगके स्रष्टाधाता॥
अर्थ
उन्होंने कहा, हे विधाता, आपसे क्या कहूँ? आप तो स्वयं संसार के सृष्टिकर्ता हैं।
मम कामना गुप्त नहिं तोंसों।
कहवावा चाहहु का मोसों॥
अर्थ
मेरी इच्छा आपसे छिपी नहीं है, फिर आप मुझसे क्या कहलवाना चाहते हैं?
इज्ञ यज्ञ महँ मरती बारा।
शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा॥
अर्थ
दक्ष-यज्ञ में जब मैंने अपना प्राण त्यागा था, तब से मेरी यही कामना है कि शंभुनाथ (शिव) पुनः मेरे हों।
सो अब मिलहिं मोहिं मनभाय।
कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये॥
अर्थ
वे अब मेरी इच्छा के अनुरूप मुझसे मिलें, यह सुनकर तथास्तु कहकर ब्रह्मा जी अपने धाम को लौट गए।
तब गिरिजा शंकर तव भयऊ।
फल कामना संशय गयऊ॥
अर्थ
तब गिरिजा का मिलन शंकर से हुआ, और फल की कामना का संशय दूर हो गया।
चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा।
तब आनन महँ करत निवासा॥
अर्थ
करोड़ों चंद्रमाओं और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश आपके मुखमंडल पर सदा निवास करता है।
माला पुस्तक अंकुश सोहै।
करमँह अपर पाश मन मोहे॥
अर्थ
आपके हाथों में माला, पुस्तक और अंकुश शोभा पाते हैं, और अन्य हाथ में धारण किया गया पाश मन को मोहित करता है।
अन्नपूर्णे! सदपूर्णे।
अज-अनवद्य अनन्त अपूर्णे॥
अर्थ
हे अन्नपूर्णा, आप सदा पूर्ण हैं; आज अनंत और अपार रूप में आप विद्यमान हैं।
कृपा सगरी क्षेमंकरी माँ।
भव-विभूति आनन्द भरी माँ॥
अर्थ
हे माँ, आप कृपा की सागर और कल्याणकारी हैं; आपका हृदय ऐश्वर्य और आनंद से परिपूर्ण है।
कमल बिलोचन विलसित बाले।
देवि कालिके! चण्डि कराले॥
अर्थ
आपके कमल-सम नेत्र आपके सुंदर मुख पर सुशोभित हैं, हे देवी कालिका, हे विकराल चंडी।
तुम कैलास मांहि ह्वै गिरिजा।
विलसी आनन्दसाथ सिन्धुजा॥
अर्थ
आप कैलास पर्वत पर गिरिजा रूप में विराजमान होकर, लक्ष्मी के साथ आनंदपूर्वक विहार करती हैं।
स्वर्ग-महालक्ष्मी कहलायी।
मर्त्य-लोक लक्ष्मी पदपायी॥
अर्थ
स्वर्ग में आप महालक्ष्मी कहलाती हैं, और मृत्युलोक में लक्ष्मी का पद प्राप्त करती हैं।
विलसी सब मँह सर्व सरुपा।
सेवत तोहिं अमर पुर-भूपा॥
अर्थ
आप सभी में विद्यमान हैं और सर्वरूपा हैं; अमरावती के राजा-महाराजा भी आपकी सेवा करते हैं।
जो पढ़िहहिं यह तुव चालीसा।
फल पइहहिं शुभ साखी ईसा॥
अर्थ
जो कोई भी आपकी यह चालीसा पढ़ेगा, उसे शुभ फल प्राप्त होगा, स्वयं ईश्वर इसके साक्षी हैं।
प्रात समय जो जन मन लायो।
पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अघिकायो॥
अर्थ
जो भक्त प्रातःकाल एकाग्र मन से इसे पढ़ता है, उसकी भक्ति और श्रद्धा और अधिक बढ़ जाती है।
स्त्री-कलत्र पति मित्र-पुत्र युत।
परमैश्वर्य लाभ लहि अद्भुत॥
अर्थ
उसे पत्नी, मित्र और पुत्रों सहित अद्भुत सुख और परम ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
राज विमुखको राज दिवावै।
जस तेरो जन-सुजस बढ़ावै॥
अर्थ
आप राज्यहीन को राज्य प्रदान करती हैं, और अपने भक्त की कीर्ति को बढ़ाती हैं।
पाठ महा मुद मंगल दाता।
भक्त मनो वांछित निधिपाता॥
अर्थ
इस चालीसा का पाठ परम आनंद और मंगल प्रदान करने वाला है; भक्त को उसकी मनोवांछित निधि प्राप्त होती है।
जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावहिंगे माथ।
तिनके कारज सिद्ध सब, साखी काशी नाथ॥
अर्थ
जो भी इस सौभाग्यशाली चालीसा को श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर पढ़ते हैं, उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं, काशीनाथ (शिव) स्वयं इसके साक्षी हैं।
अन्नपूर्णा चालीसा पाठ के लाभ
भक्त अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ तब करते हैं जब उन्हें पर्याप्तता, सुरक्षा और सुव्यवस्थित घर-परिवार की कामना होती है। नियमित पाठ से निम्न लाभ जुड़े माने जाते हैं:
- अन्न और समृद्धि: पोषण की देवी होने के नाते, अन्नपूर्णा का आह्वान किया जाता है ताकि घर में कभी अन्न या भोजन की कमी न हो।
- स्थिर परिवार: चौपाइयों में जीवनसाथी, संतान और मित्रों के लिए सामंजस्य और सुरक्षा की प्रार्थना की गई है, जिससे पारिवारिक जीवन सुदृढ़ होता है।
- भय और अभाव से राहत: चालीसा में देवी को भय और सांसारिक कष्ट दूर करने वाली बताया गया है, जो कठिन समय में सांत्वना देती है।
- समृद्धि और सम्मान: लक्ष्मी के रूप में पहचानी जाने वाली देवी से न्यायोचित धन और खोई हुई प्रतिष्ठा की पुनर्प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।
- मन की शांति: ध्यानपूर्वक पाठ करने से मन स्थिर होता है और हृदय में कृतज्ञता का भाव जागृत होता है।
- शुभ आरंभ: अन्नकूट जैसे पर्वों से पहले और किसी को भोजन कराने से पहले, कई भक्त यह पाठ करके भोजन दान को देवी को समर्पित करते हैं।
अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ कब और कैसे करें
अन्नपूर्णा चालीसा किसी भी दिन पढ़ी जा सकती है, क्योंकि पोषण की आवश्यकता प्रतिदिन होती है, परंतु अन्नकूट और अन्नपूर्णा जयंती के अवसर पर, तथा अतिथियों या जरूरतमंदों को भोजन कराने से पहले इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। स्नान के पश्चात, देवी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष स्वच्छ स्थान पर बैठें, यथासंभव दीपक जलाएँ और पके हुए अन्न या अनाज का छोटा भोग अर्पित करें। अर्थ पर ध्यान देते हुए धीरे-धीरे पाठ करें, और अंत में किसी के साथ भोजन साझा करें – यही देवी की सच्ची उपासना मानी जाती है।
अन्नपूर्णा चालीसा किसने लिखी?
अन्नपूर्णा चालीसा पारंपरिक चालीसा स्वरूप का अनुसरण करती है: एक आरंभिक दोहा, चालीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा। इसकी भाषा सरल, भक्तिपूर्ण हिंदी है। चौपाइयों में वर्णित है कि किस प्रकार पार्वती ने शोकवश अपना शरीर त्याग दिया और हिमालय-पुत्री गिरिजा के रूप में पुनर्जन्म लिया, फिर शिव से पुनर्मिलन हुआ। काशी में उन्हें अन्नपूर्णा, अर्थात अन्नदात्री, के रूप में पूजा जाता है, और उन्हें रुद्राणी, कालिका तथा महालक्ष्मी के रूप में भी पहचाना जाता है। यह एक परंपरागत रचना है जिसके किसी एक निश्चित रचयिता का उल्लेख नहीं मिलता।
सामान्य प्रश्न (FAQ)
अन्नपूर्णा चालीसा क्या है?
यह देवी अन्नपूर्णा की स्तुति में रचित चालीस चौपाइयों की भक्ति-रचना है, जिनकी पूजा काशी (वाराणसी) में अन्न और पोषण की देवी के रूप में की जाती है। वे माता पार्वती का ही एक रूप हैं, और इस चालीसा में उनसे पर्याप्तता, समृद्धि और घर-परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
अन्नपूर्णा चालीसा पाठ के क्या लाभ हैं?
भक्त इसे अन्न-समृद्धि, स्थिर एवं सामंजस्यपूर्ण घर, भय व अभाव से राहत, न्यायसंगत समृद्धि और मानसिक शांति के लिए पढ़ते हैं। भोजन अर्पित करने या बाँटने से पहले भी इसका पाठ किया जाता है।
अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है, क्योंकि पोषण प्रतिदिन आवश्यक है। अन्नकूट और अन्नपूर्णा जयंती के अवसर पर, तथा अतिथियों या जरूरतमंदों को भोजन कराने से पहले इसे विशेष शुभ माना जाता है।
अन्नपूर्णा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?
इसमें चालीस चौपाइयाँ हैं, जो आरंभिक और समापन दोहे से घिरी हैं, यह एक मानक चालीसा की संरचना है।
क्या अन्नपूर्णा चालीसा हिंदी में पढ़ी जा सकती है?
हाँ, इस पृष्ठ पर संपूर्ण चालीसा देवनागरी में दी गई है, साथ ही हर चौपाई का सरल हिंदी अर्थ भी उपलब्ध है, ताकि पाठ करने वाला भाव सहित इसका पाठ कर सके।
॥ जय माता अन्नपूर्णा ॥ • ॥ ॐ अन्नपूर्णायै नमः ॥
