शनिवार, मार्च 7, 2026
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Shri Durga Stotra in Marathi

श्री दुर्गा स्तोत्र ( Shri Durga Stotra )

श्री गणेशाय नम : ||

श्री दुर्गायै नम : ||

नगरांत प्रवेशले पंडुनंदन | तो देखिलें दुर्गास्थान |

धर्मराज करी स्तवन | जगदंबेचे तेधवां || १ ||

जय जय दुर्गे भुवनेश्वरी | यशोदागर्भसंभवकुमारी |

इंदिरारमणसहोदरी | नारायणी चंडिकेंबिके || २ ||

जय जय जगदंबे विश्र्वकुटुंबिनी | मूळस्फूर्ति प्रणवरुपिणी |

ब्रम्हानंदपददायिनी | चिद्विलासिनी अंबिके तू || ३ ||

जय जय धराधरकुमारी | सौभाग्यगंगे त्रिपुरसुंदरी |

हेरंबजननी अंतरी | प्रवेशी तू आमुचिया || ४ ||

भक्तहृदयारविंदभ्रमारी | तू कृपाबळे निर्धारी |

अतिमूढ निगमार्थ विवरी | काव्यरचना करी अद्भुत || ५ ||

तुझिये कृपावलोकनेंकरून | गर्भाधासी येतील नयन |

पांगुळ करील गमन | दूर पंथे जाऊनी || ६ ||

जन्मादारभ्य जो मुका | होय वाचस्पतीसमान बोलका |

तू स्वानंदसरोवरमराळिका | होसी भाविकां सुप्रसन्न || ७ ||

ब्रम्हानंदे आदिजननी | तव कृपेची नौका करुनी |

दुस्तरं भवसिंधू उल्लंघुनी | निवृत्तीतटा नेईजे || ८ ||

जय जय आदिकुमारिके | जय जय मूळपीठनायके |

सकलसौभाग्यदायिके | जगदंबिके मूळप्रकृति || ९ ||

जय जय भार्गवप्रिये भवानी | भयनाशके भक्तवरदायिनी |

सुभद्रकारिके हिमनगनंदिनी | त्रिपुरसुंदरी महामाये || १० ||

जय जय आनंदकासारमराळिके | पद्मनयने दुरितवनपावके |

त्रिविधतापभवमोचके | सर्व व्यापके मृडानी || ११ ||

शिव मानसकनकलतिके | जय चातुर्यचंपककलिके |

शुंभनिशुंभदैत्यांतके | निजजनपालके अपर्णे || १२ ||

तवमुखकमलशोभा देखोनी | इंदुबिंब गेले विरोनी |

ब्रम्हादिदेव बाळे तान्ही | स्वानंदसदनी निजविसी || १३ ||

जीव शिव दोन्ही बाळके | अंबे त्वां निर्मिली कौतुकें |

स्वरूप तुझे जीव नोळखे | म्हणोनि पडिला आवर्ती || १४ ||

शिव तुझे स्मरणी सावचित्त | म्हणोनि तो नित्यमुक्त |

स्वानंदपद हाता येत | तुझे कृपेनें जननीये || १५ ||

मेळवूनि पंचभूतांचा मेळ | त्वां रचिला ब्रम्हांडगोळ |

इच्छा परततां तत्काळ | क्षणे निर्मूल करिसी तू || १६ ||

अनंत बालादित्यश्रेणी | तव प्रभेमाजी गेल्या लपोनी |

सकलसौभाग्यशुभकल्याणी | रमारमणवरप्रदे || १७ ||

जय शंबरऱिपुहरवल्लभे | त्रैलोक्यनगरारंभस्तंभे |

आदिमाये आत्मप्रभे | सकलारंभे मूळप्रकृति || १८ ||

जय करुणामृतसरिते | भक्तपालके गुणभरिते |

अनंत ब्रम्हांड फलांकिते | आदिमाये अन्नपूर्णे || १९ ||

तू सच्चीदानंदप्रणवरुपिणी | सकलचराचरव्यापिनी |

सर्गस्थित्यंतकारिणी भवमोचनी ब्रम्हानंदे || २० ||

ऐकुनि धर्माचे स्तवन | दुर्गा जाहली प्रसन्न |

म्हणे तुमचे शत्रु संहारीन | राज्यी स्थापीन धर्माते || २१ ||

तुम्ही वास करा येथ | प्रकटो नेदी जनांत |

शत्रु क्षय पावती समस्त | सुख अद्भुत तुम्हां होय || २२ ||

त्वां जें स्तोत्र केलें पूर्ण | तें जें त्रिकाळ करिती पठण |

त्यांचे सर्व काम पुरवीन | सदा रक्षीन अंतर्बाह्य || २३ ||

|| इति श्री युधिष्ठिरविरचितं दुर्गा स्तोत्रं समाप्तम ||

 

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