Sunday, March 8, 2026
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Narak Chaturdashi Story in Hindi

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Narak Chaturdashi Story

नरक चतुर्दशी का त्योहार हर साल कार्तिक कृष्ण चतुदर्शी को यानी दीपावली के एक दिन पहले मनाया जाता है। इस चतुर्दशी तिथि को छोटी दीपावाली के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन प्रातः काल स्नान करके यम तर्पण एवं शाम के समय दीप दान का बड़ा महत्व है।

पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना रखा था।
नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया।

मरते समय नरकासुरने भगवान श्रीकृष्णसे वर मांगा, कि ‘आजके दिन मंगलस्नान करनेवाला नरककी यातनाओंसे बच जाए ।’ तदनुसार भगवान श्रीकृष्णने उसे वर दिया । इसलिए इस दिन सूर्योदयसे पूर्व अभ्यंगस्नान करनेकी प्रथा है । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुरको दिए गए वरके अनुसार इस दिन सूर्योदयसे पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती ।

दूसरी प्रचलित कथा
एक प्रतापी राजा थे जिनका नाम रन्ति देव था | स्वभाव से बहुत ही शांत एवम पुण्य आत्मा, इन्होने कभी भी गलती से भी किसी का अहित नहीं किया | इनकी मृत्यु का समय आया यम दूत इनके पास आये | तब इन्हें पता चला कि इन्हें मोक्ष नहीं बल्कि नरक मिला हैं | तब उन्होंने पूछा कि जब मैंने कोई पाप नहीं किया तो मुझे नरक क्यूँ भोगना पड़ रहा हैं | उन्होंने यमदूतों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया एक बार अज्ञानवश आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा चला गया था | उसी के कारण आपका नरक योग हैं | तब राजा रन्ति से हाथ जोड़कर यमराज से कुछ समय देने को कहा ताकि वे अपनी करनी सुधार सके | उनके अच्छे आचरण के कारण उन्हें यह मौका दिया गया | तब राजा रन्ति ने अपने गुरु से सारी बात कही और उपाय बताने का आग्रह किया | तब गुरु ने उन्हें सलाह दी कि वे हजार ब्राह्मणों को भोज कराये और उनसे क्षमा मांगे | रन्ति देव ने यही किया | उनके कार्य से सभी ब्राह्मण प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद के फल से रन्ति देव को मोक्ष मिला | वह दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस का था इसलिए इस दिन को नरक निवारण चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) कहा जाता हैं |

Dhanteras Puja Vidhi Mantra

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Dhanteras Puja Vidhi Mantra

Dhanteras is the first day of the five-day Diwali Festival as celebrated primarily in Northern & Western part of India. The festival, known as “Dhanatrayodashi” or “Dhanvantari Trayodashi”.The word Dhana means wealth and Trayodashi means 13th day as per Hindu calendar. It is celebrated on the thirteenth lunar day of Krishna paksha (dark fortnight) in the Hindu calendar month of Kartik.

This year Dhanteras is on 25th October 2019. Dhanteras is also known as Dhantrayodashi Puja and it is believed that during Dhantrayodashi, Goddess Lakshmi along with Lord Kuber (the god of wealth) came out of the milky cosmic sea to bless everyone with wealth, prosperity and good fortunes. Some people in India celebrate Dhantrayodashi as Dhanwantari Trayodasi as the birth anniversary of Dhanwantari (The God of Ayurveda.)

धनत्रयोदशी – Dhanteras Yamdeep daan Mantra
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात सूर्यज: प्रीयतामिति॥

इस मंत्र का अर्थ है: त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल और लक्ष्मी के साथ सूर्यनन्दन यम प्रसन्न हों। इस मंत्र के द्वारा लक्ष्मी जी भी प्रसन्न होती हैं।

Dhanteras Kuber Mantra
धनदाय नमस्तुभ्यम निधिपद्माधिवाय च I
भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धन धन्यदिसेम्पध II

Dhanteras katha in Hindi

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धनतेरह कथा (Dhanteras katha in Hindi)

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है. इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था. दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा. राज इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े. दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया.

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे. जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा. यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए. दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं सो सुनो. कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है. यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं.

यम-दीपदान (Skandpuran) Yama Deep Daan Mantra
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीको सायंकाल समय किसी पात्रामें मिट्टीके दीपक रखकर उन्हें तिलके तेलसे पूर्ण करे । उनमें नवीन रुईकी बत्ती रखे और उनको प्रकाशित करके गन्धादिसे पूजन करे। फिर दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके

‘मृत्युना दण्डपाशाभ्यां कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात्‌ सूर्यजः प्रीयतां मम ॥’

Diwali – The Festival of lights

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Diwali is just a few days away so get the best out of the festive season and enjoy this time of the year. People in India become joyous and happy and celebrate this festival with great gusto and pomp.

Diwali comes from the world Deepawali which also means Row of Lights. So the festival of Diwali is also called the Festival of Lights Diwali is the other name for this festival of lights in the northern part of India. In South India, the festival is called Deepavali.

Diwali is a five-day festival that is spread over five days. The first day is Dhanteras when everyone invokes the blessings of Goddess Lakshmi for success and prosperity besides wealth. Choti Diwali is the second day and this is also called Small Diwali or Naraka Chaturdashi in many states. it is known as Kali Chaudas in some states. Legend has it that Narakasura was an evil demon who was killed on this day. People thus worship Lord Rama and Goddess Lakshmi on this day. the third day is the main day of Diwali. This is the day when the devotees visit temples and worship and pray for success and prosperity in life. Lord Ganesha is also invoked on this day and everyone prays for successful endeavors thus removing all obstacles. An aarti is performed with oil lamps, cotton wicks and songs sung in praise of the goddess. All Indian houses have a lot of oil lamps and diyas all around the house during Diwali. Diwali is also the time when one sees a lot of colourful lanterns hung outside the front doors of all houses. Thus, it is an air of festivity all around and there is only celebration all over. Firecrackers are burst by all, and everyone likes to see the display of fireworks.
Padwa is the fourth day and is known by the name of Annakoot or Govardhan Puja. Legend has it that Lord Krishna defeated the God of Rain and heavens Lord Indra on this day. It is said that Lord Krishna lifted Mount Govardhana on this day and thus saved everyone from getting affected by the floods. People thus cook a lot of food on this day. There is another legend that the demon king Bali was defeated by Lord Vishnu on this day.

Then we have Bhaiduj which is the fifth and the last day and is also called Bhai dooj. This is known by the other name of Yama Dwitiya. This is the day when sisters and brothers meet each other to strengthen the relations. It is said that Yami was the sister of the god of Death Lord Yama. Sisters pray for the well being of the brothers on this day.

Diwali takes us from darkness to light and this is a light that gives us the power to commit ourselves to good actions and deeds. Diwali brings you closer to divinity. Lights illuminate all corners of the cities and Diwali is thus filled with a lot of hope, togetherness and joy.
Celebrate Diwali this year and enjoy this festival with a lot of festivity and happiness.

Dhanvantari Pooja on Dhanteras

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धनवन्तरी पूजा (Dhanvantari Pooja on Dhanteras)

धन्वन्तरि देवताओं के वैद्य हैं और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए धनतेरस का दिन बहुत ही महत्व पूर्ण होता है. धनतेरस के संदर्भ में एक लोक कथा प्रचलित है कि एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता क्या. दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हें परंतु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया तो उन्होंने कहा कि एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके.

धनतेरस – Dhanteras Puja Aarti
Dhanteras is a day to worship lord Dhanvantri – the God of health. He is an incarnation of Lord Vishnu. This dhanteras sing the Aarati of Lord Dhanvantri and please him.

Ayurvedicians and entire Hindu community considers Lord Dhanawantry, a god of healing and cure. He is to be considered an avatar of Lord Vishnu.It is believed that those who are sick and suffering from long lasing disease conditions and on sickbed, poor health conditions , they should do Dhanawantry pooja daily.

“ओम नामो भगवते वासू देवया डंवनतरा,
अमृता कालसा हस्थया,
सर्वामाया विनसानया,
त्रैलोक्या नतया,
श्री महा विश्णवे नमहा.”
“ओम नामो भगवते
महा सुधारषाना
वासुदेवया धन्वंतराए;
अमृता कालसा हस्थाया
सर्वा भाया विनासया
सर्वा सरव्ा रोका निवारनाया
थ्री लोकया पतए
थ्री लोकया निताए
श्री महा विष्णु स्वरूपा
श्री धन्वंतरि स्वरूपा
श्री श्री श्री
अऔशता चकरा नारायाणा स्वाहा”

Roop Chaturdashi Katha – English & Hindi

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Roop Chaturdashi Importance

It comes on fourteenth day of the Kartik Krishna Paksha. On this day Lord Shri KrishnaFast is also done on this day; by doing this Lord Krishna giving beauty and prosperity to his devotees. This day is also known as Narak Chaturdashi and Choti Diwali.

In south India, people are beautifying themselves at the most on this day and it is a belief that those who are worshipping the Lord Krishna with full of devotion after bathing and cleaning, they spend their whole year happily and cheerfully.

The importance of this day is also described in Vedas:- on this day, after bathing early in the morning do the Tarpan for Yamraaj and offer three handful of water (Jalanjali). The people whose fathers are alive can also do this Tarpan. At evening, worship the God by lightening the deeps (lights).

Roop Chaturdashi Katha

Once upon a time a saint was living in the city Hiranyagarbh in India. The saint wanted to devote himself completely into God so he went to the mausoleum. After some times, saint found small tiny insects into his body and hair. The saint was very disappointed about his condition. At same time The same time Narad ji came to him by playing harp, saint asked to Narad ji, “O Naradji I wanted to devote myself completely into the God, but why I am in this condition?” Then Narad ji replied, “O Yogiraaj, you know the contemplation but you doesn’t know about body ethics.” Then saint again questioned Naradaji, “Please do let me know about body ethics.” By seeing him in the trouble, Narad ji said to him, “At present you need not to know about body ethics, you just do, what I am telling you and by doing this you would be the same healthy and graceful.” The saint did the same as Naradji told him and by doing it he become healthy and happy and from same day fourteenth day of the Kartik Krishna Paksha called Roop Chaturdashi.It comes on fourteenth day of the Kartik Krishna Paksha. On this day Lord Shri Krishna

should be worshipped. Fast is also done on this day; by doing this Lord Krishna giving beauty and prosperity to his devotees. This day is also known as Narak Chaturdashi and Choti Diwali.In south India, people are beautifying themselves at the most on this day and it is a belief that those who are worshipping the Lord Krishna with full of devotion after bathing and cleaning, they spend their whole year happily and cheerfully.

Roop Chaturdashi Katha in Hindi

एक हिरण्यगभ नामक एक राजा थे | उन्होंने राज पाठ छोड़कर तप में अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय किया |उन्होंने कई वर्षो तक तपस्या की लेकिन उनके शरीर पर कीड़े लग गए | उनका शरीर मानों सड़ गया | हिरण्यगभ को इस बात से बहुत दुःख तब उन्होंने नारद मुनि से अपनी व्यथा कही | तब नारद मुनि ने उनसे कहा कि आप योग साधना के दौरान शरीर की स्थिती सही नहीं रखते इसलिए ऐसा परिणाम सामने आया | तब हिरण्यगभ ने इसका निवारण पूछा | तब नारद मुनि ने उनसे कहा कि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करे साथ ही रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा कर उनकी आरती करे इससे आपको पुन : अपना सौन्दर्य प्राप्त होगा | इन्होने वही किया अपने शरीर को स्वस्थ किया | इस प्रकार इस दिन को रूप चतुर्दशी (Roop Chaudas) भी कहते हैं |

Lakshmi – Kuber Mantra

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Lakshmi Kuber Mantra

Diwali – the Festival of light is incomplete without Lakshmi Puja. Chant the given lakshmi puja mantra and make your puja more fruitful.

1) Lakshmi Beej Mantra

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः।।

Om Hreem Shreem Lakshmibhayo Namah1 ||

2) Mahalakshmi Mantra

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:।।

Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed
Om Shreem Hreem Shreem Mahalakshmaye Namah ||

3) Kuber Money Mantra (God of Wealth)

धनदाय नमस्तुभ्यम निधिपद्माधिवाय च I
भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धन धन्यदिसेम्पध II

Om shreem om hreem shreem hreem kleem shreem kleem viteswaraaya namah1

4) Lakshmi Gayatri Mantra

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च
धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ ।।

Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe Vishnu Patnyai Cha Dheemahi Tanno Lakshmi Prachodayat Om ||

Maa Siddhidatri – Ninth Form of Nava Durgas

Maa Siddhidatri

सर्व सिद्धियों की दाता “माँ सिद्धिदात्री” देवी दुर्गा का नौवां व अंतिम स्वरुप हैं। नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा और कन्या पूजन के साथ ही नवरात्रों का समापन होता है। हिन्दू धर्म के पुराणों में बताया गया है कि देवी सिद्धिदात्री के चार हाथ है जिनमें वह शंख, गदा, कमल का फूल तथा चक्र धारण करे रहती हैं। यह कमल पर विराजमान रहती हैं। इनके गले में सफेद फूलों की माला तथा माथे पर तेज रहता है। इनका वाहन सिंह है। देवीपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवी की शक्तियों और महिमाओं का बखान किया गया है।

माँ सिद्धिदात्री का मंत्र (Mata Siddhidatri Mantra)
इनका उपासना मंत्र है-
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

नवरात्र का नौवां दिन (Ninth Day of Navratri): नवरात्र के नौवे दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री की पूजा इस साल ७ अक्टूबर २०१९ को होगी।

सिद्धिदात्री की ध्यान (Mata Siddhidatri Dhyan)
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

सिद्धिदात्री की स्तोत्र पाठ (Mata Siddhidatri Stotra)
कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

सिद्धिदात्री की कवच ( Mata Siddhidatri Kavach)
ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥

Maa Mahagauri – Eighth Form of Nava Durgas

Maa Mahagauri

शंख और चन्द्र के समान अत्यंत श्वेत वर्ण धारी “माँ महागौरी” माँ दुर्गा का आठवां स्वरुप हैं। नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरा की पूजा की जाती है। यह शिव जी की अर्धांगिनी है। कठोर तपस्या के बाद देवी ने शिव जी को अपने पति के रुप में प्राप्त किया था। देवी महागौरा के शरीर बहुत गोरा है। महागौरा के वस्त्र और अभुषण श्वेत होने के कारण उन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा गया है। महागौरा की चार भुजाएं है जिनमें से उनके दो हाथों में डमरु और त्रिशुल है तथा अन्य दो हाथ अभय और वर मुद्रा में है। इनका वाहन गाय है। इनके महागौरा नाम पड़ने की कथा

माँ महागौरी का मंत्र (Mata Mahagauri Mantra)
महागौरी की उपासना का मंत्र है-

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दघान्महादेवप्रमोददा॥

नवरात्र का आठवां दिन (Eight Day of Navratri): नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। कई लोग इस दिन कन्या पूजन भी करते हैं। मां महागौरी की पूजा इस साल ६ अक्टूबर २०१९ को होगी।

महागौरी की ध्यान (Mata Mahagauri Dhyan)
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

महागौरी की स्तोत्र पाठ (Mata Mahagauri Stotra)
सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

महागौरी की कवच ( Mata Mahagauri Kavach)
ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥

Maa Kaalratri – Seventh Form of Nava Durgas

Maa Kaalratri

दुर्गा जी का सातवां स्वरूप कालरात्रि है। इनका रंग काला होने के कारण ही इन्हें कालरात्रि कहते हैं। असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अपने तेज से इन्हें उत्पन्न किया था। इनकी पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें ‘शुभंकारी’ भी कहते हैं। देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह काला है इनके बाल बिखरे हुए हैं तथा इनके गले में विधुत की माला है। इनके चार हाथ है जिसमें इन्होंने एक हाथ में कटार तथा एक हाथ में लोहे कांटा धारण किया हुआ है। इसके अलावा इनके दो हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है। इनके तीन नेत्र है तथा इनके श्वास से अग्नि निकलती है। कालरात्रि का वाहन गर्दभ(गधा) है।

माँ कालरात्रि का मंत्र (Mata Kaalratri Mantra)
नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना इस मंत्र से की जा सकती है-

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

नवरात्र का सातवां दिन (Seventh Day of Navratri २०१९ ): मां कालरात्रि की पूजा ५ अक्टूबर को की जाएगी।

कालरात्रि की ध्यान (Mata Kaalratri Dhyan)
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

कालरात्रि की स्तोत्र पाठ (Mata Kaalratri Stotra)
हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥
कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥
क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

कालरात्रि की कवच ( Mata Kaalratri Kavach)
ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥