होम शनि चालीसा – अर्थ सहित संपूर्ण पाठ

शनि चालीसा

श्री शनि चालीसा — अर्थ सहित

रचयिता: राम सुंदर दास · 40 चौपाई · लगभग 7 मिनट

हिन्दी
Englishहिन्दी
इस चालीसा को साझा करें

By the BhaktiRas Editorial Team · Updated

शनि चालीसा भगवान शनि देव को समर्पित चालीस चौपाइयों की भक्ति-रचना है। शनि ग्रह के अधिपति शनि देव को हर जीव के कर्मों का निष्पक्ष लेखा रखने वाला माना जाता है। साढ़ेसाती (साढ़े सात वर्ष की अवधि) और ढैया (ढाई वर्ष की अवधि) के दौरान भक्त विशेष रूप से इस चालीसा का पाठ करते हैं, ताकि शनि देव की कृपा से विलंब, कष्ट और पूर्वकर्मों का बोझ हल्का हो सके।

शनि चालीसा पाठ (देवनागरी)

संपूर्ण पाठ — हर चौपाई के नीचे “अर्थ” पर टैप करके सरल हिंदी अर्थ देखें।

Doha

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

अर्थ

गणेश को जय है, जो गिरिजा (पार्वती) और शिव के पुत्र हैं और मंगल तथा कृपा के रूप हैं। हे नाथ, आप विनीत जनों के कष्टों को दूर कर उन्हें आनंदित करें।

Doha

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

अर्थ

शनि देव को बारंबार जय हो, हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, मुझ पर कृपा करें और अपने भक्त की लाज रखें।

1

जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

अर्थ

करुणामय शनि देव को बार-बार जय हो, जो सदा अपने भक्तों का पालन और रक्षा करते हैं।

2

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

अर्थ

शनि चार भुजाओं से सुशोभित हैं और उनका श्याम वर्ण दिव्य है। उनके मस्तक पर रत्नों का मुकुट शोभा पाता है।

3

परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

अर्थ

उनका ललाट विशाल और मनोरम है। उनकी टेढ़ी दृष्टि और सिकुड़ी भौहें भीषण प्रतीत होती हैं।

4

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।
हिये माल मुक्तन मणि दमके॥

अर्थ

उनके कानों में कुंडल चमचमाते और दमकते हैं। उनकी छाती पर मोतियों और रत्नों की माला दीप्तिमान है।

5

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

अर्थ

उनके हाथों में गदा, त्रिशूल और कुल्हाड़ी हैं। वे पलक झपकते ही शत्रुओं का विनाश कर सकते हैं।

6

पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन॥

अर्थ

वे पिंगल, कृष्णो, छाया के पुत्र, नंदन, यम के भाई, कोणस्थ, रौद्र और दुःख का विनाश करने वाले हैं। ये उनके विभिन्न नाम हैं।

7

सौरी, मन्द, शनि, दशनामा।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

अर्थ

उन्हें सौरि, मंद, शनि आदि दस नामों से जाना जाता है। सूर्यपुत्र की पूजा सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है।

8

जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं।
रंकहुं राव करैं क्षण माहीं॥

अर्थ

जिस पर प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, उसे वे पल भर में भिखारी से राजा बना सकते हैं।

9

पर्वतहू तृण होई निहारत।
तृणहू को पर्वत करि डारत॥

अर्थ

उनकी दृष्टि में पर्वत तिनका हो जाता है और तिनका पर्वत बन जाता है। ऐसी उनकी शक्ति है।

10

राज मिलत वन रामहिं दीन्हो।
कैकेइहुं की मति हरि लीन्हो॥

अर्थ

उन्हीं के कारण राजा राम को वन में निर्वासन मिला। उन्होंने कैकेयी की बुद्धि को मोह दिया।

11

बनहूं में मृग कपट दिखाई।
मातु जानकी गयी चुराई॥

अर्थ

वन में उन्होंने सोने के हिरण का भ्रम पैदा किया, जिससे माता सीता का अपहरण हुआ।

12

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।
मचिगा दल में हाहाकारा॥

अर्थ

उन्होंने लक्ष्मण को मेघनाद की शक्ति से निर्बल कर दिया, जिससे राम की सेना में हाहाकार मच गया।

13

रावण की गति मति बौराई।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

अर्थ

उन्होंने रावण की गति और बुद्धि को भ्रष्ट किया, जिससे राम के साथ उसका शत्रुता बढ़ता गया।

14

दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग बीर की डंका॥

अर्थ

उन्हीं के प्रभाव से सोने की लंका जल गई और बजरंगबली हनुमान की विजय की घोषणा हुई।

15

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।
चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

अर्थ

जब आपका प्रभाव राजा विक्रमादित्य पर पड़ा, तब एक चित्र का मयूर उनकी हार निगल गया।

16

हार नौलाखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी॥

अर्थ

नौ लाख रुपये की कीमती हार का आरोप उन पर लगाया गया और उनके हाथ-पैर तुड़वाने का आदेश दिया गया।

17

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

अर्थ

इस भीषण संकट में उन्हें अत्यंत नीच दशा में दिखाया गया, यहाँ तक कि तेल की मिल में काम करने को विवश किया गया।

18

विनय राग दीपक महँ कीन्हों।
तब प्रसन्न प्रभु है सुख दीन्हों॥

अर्थ

जब विक्रमादित्य ने दीपक राग में विनीत प्रार्थना गाई, तब प्रभु प्रसन्न हुए और उन्हें सुख प्रदान किया।

19

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।
आपहुँ भरे डोम घर पानी॥

अर्थ

राजा हरिश्चंद्र को अपनी पत्नी तक बेचनी पड़ी और स्वयं एक नीच कुल के घर में पानी भरने का काम करना पड़ा।

20

तैसे नल पर दशा सिरानी।
भूँजी-मीन कूद गयी पानी॥

अर्थ

इसी तरह राजा नल पर भी शनि का प्रकोप हुआ, जब एक पकी हुई मछली फिर से पानी में कूद गई।

21

श्री शंकरहि गहयो जब जाई।
पार्वती को सती कराई॥

अर्थ

जब आपका प्रभाव स्वयं भगवान शिव पर पड़ा, तब पार्वती को सती होना पड़ा।

22

तनिक विलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

अर्थ

जब शिव को क्रोध आया और उन्होंने गणेश को देखा, तो गणेश का सिर आकाश में उड़ गया।

23

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।
बची द्रोपदी होति उघारी॥

अर्थ

पांडवों पर भी आपका संकट पड़ा, पर केवल दिव्य कृपा से द्रौपदी की लाज बची रही।

24

कौरव के भी गति मति मारयो।
युद्ध महाभारत करि डारयो॥

अर्थ

आपने कौरवों की गति और बुद्धि भी भ्रष्ट की, जिससे महाभारत का भयंकर युद्ध हुआ।

25

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला।
लेकर कूदि परयो पाताला॥

अर्थ

आपने सूर्य को अपने मुँह में रख लिया और तुरंत ही पाताल लोक में कूद गए।

26

शेष देव-लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

अर्थ

शेषनाग ने इसे देखकर विनती की, तब आपने सूर्य को अपने मुँह से मुक्त किया।

27

वाहन प्रभु के सात सुजाना।
हय दिग्ज गर्दभ मृग स्वाना॥

अर्थ

प्रभु के सात सुंदर वाहन हैं जो संसार में जाने जाते हैं – हाथी, गधा, हिरन, कुत्ता और अन्य।

28

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

अर्थ

सियार, सिंह और अन्य नखधारी जीव भी उनके वाहन हैं। ज्योतिष प्रत्येक वाहन के अनुसार फल का निर्धारण करता है।

29

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै॥

अर्थ

जब हाथी वाहन हो तो लक्ष्मी घर में आती है और सुख-समृद्धि बढ़ती है। घोड़ा वाहन सुख लाता है।

30

गर्दभ हानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

अर्थ

गधा वाहन बहुत नुकसान करता है, पर सिंह वाहन सिद्धि और राज्य का सुख देता है।

31

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

अर्थ

सियार वाहन बुद्धि का नाश करता है और भय का संचार करता है। हिरन वाहन कष्ट देता है, यहाँ तक कि प्राण का भी खतरा हो सकता है।

32

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी॥

अर्थ

जब कुत्ता वाहन हो तो चोरी और ऐसे कष्टों का भय रहता है।

33

तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लौह चाँजी अरु तामा॥

अर्थ

इसी प्रकार उनके चार चरण हैं जिनके नाम हैं – सोना, लोहा, चाँदी और तांबा।

34

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै॥

अर्थ

जब लोहे के चरण पर प्रभु आते हैं, तब धन, परिवार और समृद्धि का विनाश हो जाता है।

35

समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्वसुख मंगल कारी॥

अर्थ

ताँबे और चाँदी के चरण शुभ होते हैं। सोने के चरण सभी सुख और मंगल से भरे होते हैं।

36

जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

अर्थ

जो प्रतिदिन शनि की यह चरित्र-कथा गाते हैं, उन्हें कभी प्रतिकूल (अशुभ) दशा का कष्ट नहीं सताता।

37

अदभुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

अर्थ

आश्चर्यमय प्रभु अपनी दिव्य लीला दिखाते हैं और शत्रुओं की शक्ति को क्षीण करते हैं।

38

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई॥

अर्थ

जब एक योग्य और विद्वान ब्राह्मण को बुलाया जाए और वह विधि-विधान से शनि-ग्रह शांति पूजा करे,

39

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत॥

अर्थ

और शनिवार को पीपल के पेड़ को पानी अर्पित करें तथा दीप और दान देकर बहुत सुख पाएँ,

40

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

अर्थ

राम सुंदर दास कहते हैं – प्रभु के दास होकर, शनि का स्मरण करने से ही सुख और प्रकाश प्राप्त होता है।

Doha

पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

अर्थ

जो कोई शनिश्चर देव के लिए यह चालीसा पढ़ने को तैयार है, यदि वह प्रतिदिन चालीसा का पाठ करे, तो वह संसार के सागर को पार कर जाता है।

शनि चालीसा पाठ के लाभ

जीवन की सबसे कठिन घड़ियों में, जब शनि का गोचर हर प्रयास को धीमा करता जान पड़ता है, हजारों भक्त शनि चालीसा का सहारा लेते आए हैं। इसके श्लोक स्मरण कराते हैं कि स्वयं श्रीराम, पांडव और बड़े-बड़े राजा भी शनि की परीक्षा से गुजरे और अंततः विजयी हुए, इसीलिए यह चालीसा जितना राहत के लिए पढ़ी जाती है, उतना ही साहस और धैर्य के लिए भी।

  • साढ़ेसाती और ढैया में राहत: साढ़े सात वर्ष की साढ़ेसाती और ढाई वर्ष की ढैया के दौरान इसका पाठ किया जाता है, ताकि विलंब, हानि और मानसिक तनाव कम हो सके।
  • कठिन समय में रक्षा: अंतिम दोहे में वचन दिया गया है कि नियमित पाठ करने वाला भक्त कठिनाइयों के भवसागर को पार कर जाता है।
  • कर्मों का न्यायपूर्ण निर्णय: शनि देव को कर्मों का निष्पक्ष न्यायाधीश माना जाता है, इसलिए इस चालीसा में उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे भक्त के कर्मों का फल संतुलित और न्यायसंगत रूप से दें।
  • अनुशासन और धैर्य: प्रतिदिन पाठ करने से मन में धैर्य, एकाग्रता और बाधाओं से जूझने का संकल्प दृढ़ होता है।

शनि चालीसा का पाठ कब और कैसे करें

शनिवार शनि देव को समर्पित दिन माना जाता है, इसलिए अधिकतर भक्त इसी दिन, विशेषकर प्रातःकाल या संध्या के समय, शनि चालीसा का पाठ करते हैं। परंपरा के अनुसार शनि देव की प्रतिमा के सामने बैठकर सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है, और काले तिल, काले वस्त्र या लोहे की वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं। पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाना भी शुभ माना जाता है। साढ़ेसाती या ढैया से गुजर रहे भक्त प्रायः इसका नित्य पाठ करते हैं, और संकल्प पूरा करने के लिए चालीस दिन का पाठ-क्रम भी प्रचलित है।

शनि चालीसा किसने लिखी?

शनि देव सूर्यदेव और छाया के पुत्र, तथा धर्मराज यम के भाई माने जाते हैं। वे शनि ग्रह के अधिपति हैं, समस्त ग्रहों में सबसे धीमी चाल वाला ग्रह। उनकी यही मंद गति उनकी भूमिका का प्रतीक है: वे बिना जल्दबाजी और बिना पक्षपात के हर व्यक्ति के कर्मों को तौलते हैं और समय आने पर उनका उचित फल देते हैं। इस चालीसा की रचना अंतिम चौपाई में स्वयं को ‘राम सुंदर दास’ कहने वाले एक कवि ने की थी, जिन्होंने देवताओं और राजाओं की कथाओं के माध्यम से चालीस सरल चौपाइयों में यह भाव पिरोया है कि शनि देव की कठोर परीक्षाएँ न्याय का विधान हैं, क्रूरता नहीं।

सामान्य प्रश्न (FAQ)

शनि चालीसा किसे समर्पित है?

यह शनि देव को समर्पित है, सूर्यदेव और छाया के पुत्र, जो शनि ग्रह के अधिपति हैं और हर व्यक्ति के कर्मों का निष्पक्ष फल देते हैं।

शनि चालीसा में कितने श्लोक हैं?

इसके मानक स्वरूप में चालीस चौपाइयाँ हैं, जिनके आरंभ में दो दोहे (एक श्री गणेश को, एक शनि देव को समर्पित) और अंत में एक समापन दोहा है।

शनि चालीसा के पाठ के क्या लाभ हैं?

भक्त इसे शनि की परीक्षा के समय राहत पाने, कठिन समय में रक्षा माँगने, कर्मों का न्यायसंगत फल पाने, तथा विलंब और बाधाओं को सहने के लिए धैर्य व अनुशासन प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं।

शनि चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?

शनिवार इसके लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है, आमतौर पर प्रातः या संध्या के समय शनि देव की प्रतिमा के सामने, प्रायः तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाकर। साढ़ेसाती या ढैया के दौरान इसका नित्य पाठ किया जाता है।

क्या शनि चालीसा साढ़ेसाती में मदद करता है?

हाँ, साढ़े सात वर्ष की साढ़ेसाती और ढाई वर्ष की ढैया के दौरान यह सबसे प्रचलित उपायों में से एक है, जो इनके प्रभाव को हल्का करने और मन को स्थिर रखने के लिए पढ़ा जाता है।

॥ जय शनि देव ॥  •  ॥ ओं शं शनैश्चराय नमः ॥